तंजावुर : विश्व प्रसिद्ध बृहदेश्वर (बड़ा) मंदिर में अष्ट-दिक्पालों की मूर्तियों के लापता होने और क्षतिग्रस्त प्रतिमाओं के मामले ने एक बार फिर मंदिर संरक्षण और विरासत सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चेन्नई हाई कोर्ट की मदुरै पीठ के निर्देश के बाद गुरुवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती (एचआर एंड सीई) विभाग के अधिकारियों ने मंदिर परिसर का संयुक्त निरीक्षण कर स्थिति का जायजा लिया। न्यायालय के आदेश के तहत तैयार की जाने वाली रिपोर्ट 28 जुलाई को अदालत में प्रस्तुत की जाएगी।
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर चोल स्थापत्य कला का अनुपम उदाहरण माना जाता है। इस ऐतिहासिक मंदिर में भगवान शिव की पूजा के साथ-साथ आगम शास्त्रों के अनुसार आठ दिशाओं की रक्षा करने वाले अष्ट-दिक्पाल देवताओं—इंद्र, अग्नि, यम, नैऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशान—के लिए अलग-अलग मंदिर भी बनाए गए हैं। इन सभी देवताओं का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है।
हालांकि, वर्तमान में इन आठ मंदिरों में से चार—इंद्र, यम, नैऋति और कुबेर—के गर्भगृह खाली पड़े हैं। इन मंदिरों से मूल मूर्तियां गायब हैं और संबंधित मंदिरों को बंद कर दिया गया है। वहीं शेष चार मंदिरों में स्थापित मूर्तियां भी लंबे समय से उचित संरक्षण और रखरखाव के अभाव में क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। प्रतिमाओं की जर्जर स्थिति के कारण वहां नियमित पूजा-अर्चना भी प्रभावित हो रही है और श्रद्धालु इन देवताओं के दर्शन तथा पूजा से वंचित हैं।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि आगम परंपरा के अनुसार किसी भी शिव मंदिर में अष्ट-दिक्पालों की उपस्थिति और उनकी नियमित पूजा का विशेष महत्व होता है। इन मंदिरों की उपेक्षा न केवल धार्मिक परंपराओं के विपरीत है, बल्कि यह सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
इसी मुद्दे को लेकर तंजावुर निवासी कलियामूर्ति ने वर्ष 2019 में चेन्नई हाई कोर्ट की मदुरै पीठ में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया कि जिन मंदिरों की मूर्तियां क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, वहां नई प्रतिमाएं स्थापित करने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से अनुमति दिलाई जाए, ताकि अष्ट-दिक्पालों की पूजा पुनः विधिवत शुरू हो सके। याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की कि जिन मंदिरों से मूर्तियां गायब हैं, उनकी जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए और आवश्यक संरक्षण कार्य तत्काल शुरू किया जाए।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सी. वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने की। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के तंजावुर संयुक्त आयुक्त, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों तथा मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी को संयुक्त रूप से मंदिर का निरीक्षण करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि निरीक्षण के दौरान मूर्तियों की वर्तमान स्थिति, उनके संरक्षण, लापता प्रतिमाओं और भविष्य में किए जाने वाले सुधारात्मक उपायों का विस्तृत विवरण तैयार किया जाए।
हाई कोर्ट के आदेश के अनुपालन में गुरुवार को अधिकारियों की संयुक्त टीम ने मंदिर परिसर का गहन निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान अष्ट-दिक्पाल मंदिरों की स्थिति, खाली पड़े गर्भगृह, क्षतिग्रस्त प्रतिमाओं तथा संरक्षण संबंधी व्यवस्थाओं का बारीकी से आकलन किया गया। अधिकारियों ने उपलब्ध अभिलेखों और मंदिर प्रशासन से भी आवश्यक जानकारी जुटाई, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मूर्तियां कब और किन परिस्थितियों में लापता हुईं तथा उनकी खोज के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
सूत्रों के अनुसार, संयुक्त टीम मंदिर परिसर में उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरालेखों और पूर्व में किए गए संरक्षण कार्यों का भी अध्ययन कर रही है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया जाएगा कि क्षतिग्रस्त मूर्तियों के संरक्षण या नई प्रतिमाओं की स्थापना के लिए कौन-कौन सी कानूनी और तकनीकी प्रक्रियाएं अपनानी होंगी।
विरासत संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि बृहदेश्वर मंदिर जैसे ऐतिहासिक स्मारकों में धार्मिक परंपराओं और पुरातात्विक संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। एक ओर मंदिर की मूल संरचना और ऐतिहासिक महत्व को सुरक्षित रखना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था और पूजा-अर्चना की निरंतरता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
स्थानीय श्रद्धालुओं और सामाजिक संगठनों ने भी मंदिर में अष्ट-दिक्पालों की नियमित पूजा बहाल करने की मांग दोहराई है। उनका कहना है कि वर्षों से बंद पड़े मंदिरों को फिर से खोलने और आवश्यक धार्मिक व्यवस्थाएं बहाल करने के लिए सरकार तथा संबंधित विभागों को प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए।
अब सभी की निगाहें 28 जुलाई को हाई कोर्ट में प्रस्तुत की जाने वाली संयुक्त रिपोर्ट पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि रिपोर्ट के आधार पर अदालत आगे के निर्देश जारी करेगी, जिससे लापता मूर्तियों की जांच, क्षतिग्रस्त प्रतिमाओं के संरक्षण और धार्मिक परंपराओं की बहाली की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें। यह मामला न केवल एक ऐतिहासिक मंदिर की सुरक्षा से जुड़ा है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के संरक्षण के महत्व को भी रेखांकित करता है।