Chennai चेन्नई। चुनाव आयोग द्वारा 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्पेशल समरी रिवीजन (SIR) के दूसरे चरण की घोषणा के बाद, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और उद्देश्य पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पार्टी के प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग (ECI) मतदाता सूची की समीक्षा को “नागरिकता जांच” में बदल रहा है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। अन्नादुरई ने कहा, “हम यह जानना चाहते हैं कि बिहार में जो अनुभव हुआ, उससे चुनाव आयोग ने क्या सीखा? और अब वही प्रक्रिया 12 राज्यों में लागू करते समय आयोग ने क्या बदलाव किए हैं? सबसे बड़ा सवाल है कि असम को इस प्रक्रिया से बाहर क्यों रखा गया है?
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की भूमिका अब निष्पक्ष नहीं रही और वह बीजेपी के हित में काम कर रहा है। उन्होंने कहा, “कब से SIR एक नागरिकता आधारित अभ्यास बन गया? चुनाव आयोग को यह बताना चाहिए कि क्या वह अब नागरिकता खोजने वाली एजेंसी बन गया है? अगर ऐसा है, तो बिहार में कितने अवैध प्रवासियों को उन्होंने खोज निकाला? डीएमके प्रवक्ता ने आगे कहा कि बिहार में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के चलते करीब 65 लाख मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर दिया गया। उन्होंने कहा, “इन मतदाताओं के नाम केवल इसलिए हटा दिए गए क्योंकि आयोग ने कुछ दस्तावेज स्वीकार नहीं किए। जब राशन कार्ड, मनरेगा कार्ड और अन्य सरकारी पहचान पत्र अब तक मान्य थे, तो अचानक इन्हें अस्वीकार क्यों किया जा रहा है?
उन्होंने आयोग द्वारा 2003 को कटऑफ वर्ष तय करने पर भी सवाल उठाए। सरवनन ने कहा, “क्यों 2003 को आधार वर्ष बनाया गया है? इससे आखिर फायदा किसे मिलेगा? यह तय करने की जरूरत है कि यह प्रक्रिया किसी राजनीतिक लाभ के लिए तो नहीं अपनाई जा रही। डीएमके नेता ने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के पास इस पूरी प्रक्रिया के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं, जिससे भ्रम और आशंका दोनों पैदा हो रही हैं। उन्होंने कहा, “अचानक चुनाव आयोग क्यों जागा और कहने लगा कि हम अब यह प्रक्रिया करेंगे? जनता का विश्वास पहले ही आयोग से उठ चुका है। जिस तरह से आयोग ने पहले बीजेपी के साथ मिलकर मतदाता सूची में हेरफेर की, अब वही दोहराया जा रहा है।
अन्नादुरई ने कहा कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता अब ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आयोग ने इस मुद्दे पर पारदर्शिता नहीं दिखाई, तो विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला मानते हुए विरोध तेज करेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि डीएमके का यह बयान दक्षिण भारत की राजनीति में एक बार फिर केंद्र बन सकता है, खासकर तब जब विपक्षी दल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर पहले से सवाल उठा रहे हैं।