temples:में अब नहीं चलेगी नियमों की अनदेखी मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
चेन्नई/मदुरै : 28 अक्टूबर 2026। तमिलनाडु के आगमिक मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर मद्रास हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अन्य धर्मों के धार्मिक चिह्न धारण करने वाले गैर-हिंदू व्यक्ति संबंधित मंदिर के देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त किए बिना मंदिर परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते। इसके लिए उन्हें मंदिर प्रशासन द्वारा निर्धारित प्रारूप में शपथपत्र या लिखित संकल्प देना होगा। अदालत ने कहा कि धार्मिक परंपराओं और मंदिरों की पवित्रता का सम्मान करना आवश्यक है। हालांकि, यह आदेश सभी मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि विशेष रूप से आगमिक परंपराओं से संचालित मंदिरों से संबंधित है।
गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी. मुरुगन की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आगमिक मंदिरों की धार्मिक परंपराओं और नियमों का पालन किया जाना चाहिए।अदालत ने स्पष्ट किया कि गैर-हिंदू व्यक्ति यदि मंदिर में प्रवेश करना चाहते हैं, तो उन्हें संबंधित देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करनी होगी। साथ ही मंदिर की परंपराओं और पूजा-पद्धति का पालन करने का लिखित संकल्प देना होगा।कोर्ट ने कहा कि जो गैर-हिंदू निर्धारित शपथपत्र पर हस्ताक्षर नहीं करते, उन्हें मंदिर के ध्वज-स्तंभ से आगे जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।इसके अतिरिक्त अदालत ने कहा कि दूसरे धर्मों के धार्मिक प्रतीक धारण करने वाले और संबंधित देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त नहीं करने वाले व्यक्तियों को मंदिर परिसर में भी प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला मदुरै निवासी के. थंगम वेंकटेश द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण अधिनियम, 1947 और उससे संबंधित नियमों का पालन सुनिश्चित कराने की मांग की थी।याचिका में आरोप लगाया गया था कि कुछ स्थानों पर मंदिरों के निर्धारित प्रवेश नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। गैर-हिंदू व्यक्तियों को धार्मिक परंपराओं के अनुरूप आवश्यक औपचारिकताएं पूरी किए बिना प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश दिया जा रहा है।याचिकाकर्ता ने संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जांच और मंदिरों की स्थापित परंपराओं को लागू करने की मांग की थी।इस मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने मंदिर प्रशासन और ट्रस्टियों को आगमिक नियमों का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
शपथपत्र में क्या करना होगा स्वीकार?
अदालत के फैसले के अनुसार, गैर-हिंदू आगंतुक को मंदिर के निर्धारित प्रारूप में यह स्वीकार करना होगा कि वह संबंधित देवता के प्रति श्रद्धा रखता है और मंदिर की धार्मिक परंपराओं तथा रीति-रिवाजों का सम्मान करेगा।इसका उद्देश्य मंदिर में प्रवेश करने वाले लोगों से वहां की स्थापित धार्मिक व्यवस्था का पालन सुनिश्चित कराना बताया गया है।हालांकि, अदालत ने सभी गैर-हिंदुओं को अपने धार्मिक चिह्न हटाने का कोई सार्वभौमिक आदेश नहीं दिया है। फैसले में विशेष रूप से धार्मिक चिह्न धारण करने और देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त न करने की स्थिति का उल्लेख किया गया है।
मंदिरों में राजनीतिक गतिविधियों पर भी अदालत की नाराजगी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कुछ राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा मंदिर परिसरों में किए जाने वाले आचरण पर भी नाराजगी जताई।अदालत ने मदुरै के प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर और तिरुचेंदूर मंदिर से जुड़े उदाहरणों का उल्लेख किया। न्यायाधीशों ने ऐसे मामलों पर सवाल उठाए, जिनमें कथित तौर पर गैर-हिंदू राजनीतिक प्रतिनिधियों ने आवश्यक धार्मिक औपचारिकताओं का पालन किए बिना मंदिर परिसर में प्रवेश किया था।खंडपीठ ने कहा कि मंदिरों की परंपराओं को राजनीतिक दिखावे या नेताओं के प्रति चाटुकारिता के कारण नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि धार्मिक स्थलों में प्रवेश के दौरान संबंधित संस्थान के नियमों और मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
क्या होते हैं आगमिक मंदिर?
आगमिक मंदिर वे हिंदू मंदिर हैं, जिनमें पूजा-अर्चना, देव प्रतिमाओं की स्थापना, धार्मिक अनुष्ठान और मंदिर के संचालन से जुड़ी व्यवस्थाएं आगम शास्त्रों के अनुसार निर्धारित की जाती हैं।आगम शास्त्रों में मंदिर निर्माण, पूजा विधि, धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिर के विभिन्न भागों के उपयोग से संबंधित परंपराओं का वर्णन मिलता है।तमिलनाडु में कई प्रसिद्ध मंदिर आगमिक परंपराओं का पालन करते हैं। इन मंदिरों में गर्भगृह, मंडप और ध्वज-स्तंभ जैसे अलग-अलग धार्मिक क्षेत्रों से जुड़े विशेष नियम होते हैं।इन्हीं नियमों और धार्मिक परंपराओं के पालन को लेकर अदालत में विवाद पहुंचा था।
संविधान को बताया सर्वोपरि
मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय संविधान की सर्वोच्चता को भी रेखांकित किया।अदालत ने कहा कि पुराने धार्मिक नियमों को संविधान से ऊपर नहीं रखा जा सकता। जो परंपराएं संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं, उन्हें संविधान के सामने झुकना होगा।इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि गैर-हिंदुओं द्वारा आवश्यक शपथपत्र नहीं दिए जाने की स्थिति में आगमिक मंदिरों के संबंधित प्रवेश प्रतिबंध लागू रहेंगे।अदालत ने वर्ष 1972 और 2024 के पुराने न्यायिक फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें मंदिर प्रवेश के नियमों और गैर-हिंदुओं से लिखित संकल्प लेने के मुद्दों पर विचार किया गया था।
मंदिर ट्रस्टियों को नियमों का पालन कराने के निर्देश
हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के आगमिक मंदिरों के ट्रस्टियों को प्रवेश संबंधी निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने को कहा है।मंदिर प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि गैर-हिंदू आगंतुक आवश्यक लिखित संकल्प दिए बिना ध्वज-स्तंभ के आगे न जाएं।इस फैसले के बाद मंदिरों में प्रवेश व्यवस्था और धार्मिक औपचारिकताओं को लेकर प्रशासनिक स्तर पर अधिक सतर्कता बरते जाने की संभावना है।
धार्मिक स्वतंत्रता और मंदिर परंपराओं को लेकर अहम फैसला
मद्रास हाईकोर्ट का यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता, मंदिर प्रशासन और परंपरागत पूजा-पद्धतियों से जुड़े कानूनी सवालों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।फैसले में एक ओर मंदिरों की स्थापित धार्मिक परंपराओं के पालन पर जोर दिया गया है, वहीं दूसरी ओर संविधान की सर्वोच्चता भी स्वीकार की गई है।अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित मंदिर प्रशासन को निर्धारित शर्तों के अनुरूप प्रवेश व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए हैं।