सिक्किम हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन, जिला जज प्रज्वल खतिवाड़ा निलंबित
प्रमोशन और नियुक्तियों में अनियमितता के आरोप
गंगटोक : सिक्किम हाई कोर्ट ने डिस्ट्रिक्ट जज प्रज्वल खातीवाड़ा को सस्पेंड कर दिया है। प्रज्वल अभी मंगन में डिस्ट्रिक्ट और सेशंस जज के तौर पर काम कर रहे हैं। उन पर हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के तौर पर अपने पिछले कार्यकाल के दौरान एडमिनिस्ट्रेटिव गड़बड़ियों और गलत कामों के आरोप लगे हैं। यह सस्पेंशन तब हुआ जब ज्यूडिशियल ऑफिसर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि उस समय के एक सिटिंग हाई कोर्ट जज के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के बाद उन पर बदले की कार्रवाई की गई थी।
बार एंड बेंच की 7 नवंबर को छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, सस्पेंशन ऑर्डर 4 नवंबर को सिक्किम हाई कोर्ट के फुल कोर्ट के फैसले के बाद जारी किया गया था। खातीवाड़ा को तुरंत प्रभाव से, डिसिप्लिनरी कार्रवाई पेंडिंग रहने तक और अगले आदेश तक सस्पेंड कर दिया गया है। खबर है कि फुल कोर्ट ने दो शो-कॉज नोटिस पर उनके दिए गए जवाबों को पहली नजर में ठीक नहीं पाया और यह नतीजा निकाला कि ऑफिस में उनका बने रहना न्याय के सही एडमिनिस्ट्रेशन के लिए सही नहीं है।
डिसिप्लिनरी कार्रवाई मुख्य रूप से सिक्किम हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के तौर पर खातीवाड़ा के कार्यकाल से जुड़े आरोपों से जुड़ी है। आरोपों में प्रमोशन, सर्विस अपग्रेडेशन और अपॉइंटमेंट शामिल हैं, जो कथित तौर पर बिना किसी कानूनी या एडमिनिस्ट्रेटिव वजह के या लागू नियमों के खिलाफ किए गए थे।
सस्पेंशन ऑर्डर में कथित गड़बड़ियों से लगभग 1.64 करोड़ रुपये के अनुमानित फाइनेंशियल नुकसान का ज़िक्र है। फुल कोर्ट ने कहा कि ऊंचे अधिकारियों से मंज़ूरी मिलने से कोई ज्यूडिशियल ऑफिसर अपने आप इंडिपेंडेंट एडमिनिस्ट्रेटिव ज़िम्मेदारियों से बरी नहीं हो जाएगा।
कार्रवाई में बताई गई दूसरी चिंताओं में 6 अगस्त का एक कम्युनिकेशन शामिल है जिसमें विजिलेंस जांच के दौरान गवाहों से पूछताछ पर सवाल उठाया गया है, बार-बार निर्देश देने के बावजूद एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट जमा न करना, और ज्यूडिशियल ऑफिसर के तौर पर ठीक न माने जाने वाले व्यवहार के आरोप शामिल हैं। फुल कोर्ट ने ऑफिशियल नोटिस पर खातीवाड़ा के जवाबों के असंयमित और आरोप लगाने वाले लहजे पर भी आपत्ति जताई।
ये आरोप अभी भी डिसिप्लिनरी जांच के अधीन हैं और इन्हें दोष के पक्के सबूत नहीं माना जाना चाहिए। सस्पेंशन ने इसलिए ध्यान खींचा है क्योंकि खातीवाड़ा ने पहले संविधान के आर्टिकल 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसमें 12 अगस्त, 2026 को जारी एक कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी गई थी।
अपनी याचिका में, न्यायिक अधिकारी ने आरोप लगाया कि यह विवाद तब शुरू हुआ जब उन्होंने 12 दिसंबर, 2025 को सिक्किम हाई कोर्ट के उस समय के एक जज के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसमें जज पर बुरे बर्ताव और बेइज्जती का आरोप लगाया गया था। उन्होंने आगे दावा किया कि संबंधित हाई कोर्ट जज को उसके तुरंत बाद एक्टिंग चीफ जस्टिस नियुक्त किया गया था और बाद में उन्हें कई एडमिनिस्ट्रेटिव कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा, जिन्हें उन्होंने बदले की कार्रवाई माना।
9 सितंबर, 2026 को, भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने खातीवाड़ा को सही राहत के लिए हाई कोर्ट जाने की आज़ादी दी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उसने उनके आरोपों के मेरिट पर कोई राय नहीं दी है। खास बात यह है कि 4 नवंबर के सस्पेंशन ऑर्डर में खातीवाड़ा की हाई कोर्ट जज के खिलाफ शिकायत या सुप्रीम कोर्ट के सामने उनकी याचिका का कोई ज़िक्र नहीं है। उन कार्रवाई और सस्पेंशन के बीच कोई सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है। 33 चार्ज के आर्टिकल का जवाब देते हुए अपने लिखित बचाव में, खातीवाड़ा ने आरोपों से इनकार किया है और डिसिप्लिनरी कार्रवाई के बने रहने पर सवाल उठाया है।
उन्होंने कहा कि जिन अपॉइंटमेंट, प्रमोशन और सर्विस अपग्रेड की जांच हो रही है, वे संविधान के आर्टिकल 229 के तहत चीफ जस्टिस द्वारा लिए गए फैसले थे। उनके बचाव के अनुसार, रजिस्ट्रार जनरल के तौर पर उनकी ज़िम्मेदारियां चीफ जस्टिस से मिले निर्देशों के अनुसार एडमिनिस्ट्रेटिव प्रपोज़ल तैयार करने और जमा करने तक ही सीमित थीं। खातीवाड़ा ने यह भी कहा कि प्रमोशन की सिफारिश एक डिपार्टमेंटल प्रमोशन कमेटी ने एकमत से की थी, जिसके वह सिर्फ़ एक सदस्य थे। उन्होंने सवाल किया कि सिर्फ़ उनके खिलाफ डिसिप्लिनरी कार्रवाई क्यों शुरू की गई।
न्यायिक अधिकारी ने आगे प्रोसिजरल कमियों का आरोप लगाया, जिसमें फुल कोर्ट मीटिंग मिनट्स जैसे ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स न देना भी शामिल है। उन्होंने तर्क दिया कि 33 चार्ज के आर्टिकल का जवाब देने के लिए दिया गया 30 दिन का समय, जिसमें कोर्ट की छुट्टियां भी शामिल हैं, काफी नहीं था और कुछ आरोप पहली बार फॉर्मल चार्ज मेमोरेंडम में सामने आए थे। इन घटनाओं ने ज्यूडिशियल अधिकारियों को कंट्रोल करने वाले डिसिप्लिनरी फ्रेमवर्क और हाई कोर्ट की व्यवस्था में निभाई जाने वाली एडमिनिस्ट्रेटिव ज़िम्मेदारियों की ओर ध्यान खींचा है। जबकि फुल कोर्ट ने सस्पेंशन के लिए कथित फाइनेंशियल गड़बड़ियों, एडमिनिस्ट्रेटिव चूक और गलत काम को आधार बताया है, खातीवाड़ा अपने खिलाफ आरोपों और अपनाए गए प्रोसेस पर बहस करते रहे हैं। यह सस्पेंशन एक अंतरिम एडमिनिस्ट्रेटिव कदम है जो डिसिप्लिनरी कार्रवाई तक चलेगा।