नई दिल्ली: ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के बढ़ते खतरे को लेकर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) ने मीडिया सेंसिटाइज़ेशन वर्कशॉप का आयोजन किया। कार्यशाला का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिम, पूर्व चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन को लेकर मीडिया की समझ को मजबूत करना था। कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों का विस्तार हो रहा है, जिससे अचानक बाढ़ (GLOF) की घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में वैज्ञानिक जानकारी को आम लोगों तक सही तरीके से पहुंचाना बेहद जरूरी है।

GLOF से बढ़ रहा हिमालयी क्षेत्रों में खतरा
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड तब होती है जब किसी ग्लेशियर से बनी झील का बांध अचानक टूट जाता है और बड़ी मात्रा में पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। इससे पहाड़ी इलाकों में जान-माल और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता है। विशेषज्ञों ने बताया कि सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अन्य हिमालयी राज्यों में GLOF जोखिम वाले क्षेत्रों की लगातार निगरानी की जा रही है।
मीडिया की भूमिका पर जोर
वर्कशॉप में वैज्ञानिकों और आपदा विशेषज्ञों ने कहा कि आपदा के समय सही और समय पर जानकारी पहुंचाने में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। गलत जानकारी और अफवाहों को रोकने के लिए वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग जरूरी है। मीडिया प्रतिनिधियों को GLOF की पहचान, जोखिम वाले क्षेत्रों, निगरानी तकनीक और बचाव उपायों की जानकारी दी गई।
पूर्व चेतावनी प्रणाली पर चर्चा
कार्यक्रम में ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए इस्तेमाल हो रही आधुनिक तकनीकों और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि समय रहते चेतावनी मिलने से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है और नुकसान को कम किया जा सकता है। DST की इस पहल का उद्देश्य विज्ञान, प्रशासन और मीडिया के बीच बेहतर तालमेल बनाना है, ताकि हिमालयी आपदाओं से निपटने की तैयारी मजबूत हो सके।
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