हत्या प्रयास केस में तीन युवकों को मिली क्लीन चिट

Update: 2026-08-01 13:54 GMT

चंडीगढ़ जिला: अदालत ने आठ साल पुराने हत्या के प्रयास, घर में घुसकर हमला और तोड़फोड़ के मामले में तीन आरोपितों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और भरोसेमंद सबूत पेश नहीं कर सका। गवाहों के बार-बार बदलते बयानों और मामले में सामने आए विरोधाभासों का लाभ आरोपितों को मिला।

बरी किए गए युवकों में रामदरबार निवासी दीपक उर्फ दीपा, गौरव और दलीप शामिल हैं। इन तीनों के खिलाफ वर्ष 2018 में सेक्टर-31 थाना पुलिस ने मामला दर्ज किया था। आरोप था कि उन्होंने घर में घुसकर हमला किया, तोड़फोड़ की और जान से मारने की कोशिश की। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोप साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी होते हैं। इस मामले में मुख्य गवाहों के बयान लगातार बदलते रहे, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी कमजोर हो गई। गवाहों के विरोधाभासी बयानों के कारण अदालत ने आरोपितों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

आरोपितों की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट विजय कुमार ने अदालत में दलील दी कि अभियोजन पक्ष के प्रमुख गवाहों ने पहले दिए गए अपने बयानों से बाद में दूरी बना ली थी। उन्होंने आरोपितों को पहचानने से भी इनकार कर दिया था। इसके बाद जब दोबारा उनकी गवाही कराई गई तो उनके बयान फिर बदल गए।

एडवोकेट विजय कुमार ने कहा कि ऐसे बदलते और विरोधाभासी बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने अदालत के सामने तर्क रखा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। अदालत ने इन दलीलों को महत्वपूर्ण मानते हुए आरोपितों को राहत दी।

मामला 14 मार्च 2018 का है। शिकायत के अनुसार, उस दिन शाम के समय दीपक उर्फ दीपा, गौरव और उनके कुछ साथी तलवार और डंडों से लैस होकर शिकायतकर्ता के घर पहुंचे थे। आरोप था कि सभी आरोपित जबरन घर में घुस गए और वहां तोड़फोड़ शुरू कर दी।

शिकायत में बताया गया था कि हमलावरों ने घर में मौजूद आशा देवी और उनके छोटे बेटे पूरन पर हमला किया। आरोप था कि दीपक ने आशा देवी के सिर पर धारदार हथियार से वार किया, जबकि पूरन की आंख पर भी हमला किया गया। घटना के बाद आरोपित जान से मारने की धमकी देकर मौके से फरार हो गए थे।

इस मामले में शिकायत के आधार पर सेक्टर-31 थाना पुलिस ने हत्या के प्रयास समेत कई गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी। पुलिस जांच के बाद आरोपितों के खिलाफ अदालत में चालान पेश किया गया था।

करीब आठ साल तक चले इस मामले में अभियोजन पक्ष ने कई गवाहों को पेश किया, लेकिन सुनवाई के दौरान उनके बयानों में बदलाव सामने आया। अदालत ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद फैसला सुनाया कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

अदालत के इस फैसले के बाद तीनों आरोपितों को बड़ी राहत मिली है। वहीं, यह मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि आपराधिक मामलों में गवाहों की विश्वसनीयता और ठोस साक्ष्यों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि अभियोजन पक्ष मजबूत प्रमाणों के साथ अपराध साबित न कर दे।

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