तरनतारन : 30 अक्टूबर 2026। पंजाब में धान की कटाई के साथ पराली जलाने की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए तरनतारन जिला प्रशासन ने अभियान तेज कर दिया है। प्रशासन और कृषि विभाग की संयुक्त टीमें गांव-गांव पहुंचकर किसानों को पराली नहीं जलाने के लिए जागरूक कर रही हैं। इसके साथ ही पराली को बायोमास ईंधन और अन्य उपयोगी उत्पादों में बदलने की व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि पराली को खेतों में जलाने के बजाय उसका वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करना जरूरी है। इस दिशा में किसानों को कृषि मशीनरी उपलब्ध कराने, पराली एकत्र करने और उद्योगों तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं।
तरनतारन जिले में पराली जलाने की घटनाएं प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। शुक्रवार को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में इस सीजन के दौरान अब तक 1,007 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें सबसे अधिक 397 घटनाएं तरनतारन जिले में सामने आई हैं। इसके बाद अमृतसर में 171 और फिरोजपुर में 104 मामले दर्ज किए गए हैं। गुरुवार को पूरे पंजाब में 194 स्थानों पर खेतों में आग लगने की घटनाएं सामने आईं, जो इस सीजन में एक दिन का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
इन घटनाओं को देखते हुए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने भी तरनतारन और अमृतसर प्रशासन को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। 24 अक्टूबर को आयोग के अध्यक्ष राजेश वर्मा की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में दोनों जिलों में पराली प्रबंधन की तैयारियों और बढ़ती आग की घटनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई थी। आयोग ने तरनतारन के उपायुक्त को पराली जलाने की रोकथाम को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के निर्देश दिए थे।आयोग ने स्पष्ट किया था कि पराली प्रबंधन में लापरवाही या निर्देशों का पालन नहीं होने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है। इसके साथ ही किसानों को केवल मशीनों के बारे में जानकारी देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि आवश्यक मशीनरी समय पर उनके खेतों तक पहुंचे।
जिला प्रशासन ने विभिन्न गांवों में निगरानी बढ़ा दी है। खडूर साहिब के उपमंडल मजिस्ट्रेट संजीव कुमार शर्मा और कृषि विकास अधिकारी डॉ. यादविंदर सिंह ने कई गांवों का दौरा कर पराली प्रबंधन की स्थिति का जायजा लिया। इनमें खडूर साहिब, नागोके, नागोके मोड़, मियांविंड, उप्पल और कोटली सरू खान जैसे गांव शामिल हैं।निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने किसानों से अपील की कि वे धान की कटाई के बाद बचे अवशेषों को जलाने के बजाय आधुनिक कृषि मशीनों की सहायता से उनका प्रबंधन करें। अधिकारियों ने किसानों को पराली के वैकल्पिक उपयोग और उससे होने वाले पर्यावरणीय लाभों की जानकारी भी दी।
इस बीच उप्पल गांव में पराली जलाने की एक घटना सामने आने पर प्रशासन और कृषि विभाग की संयुक्त टीम ने मौके पर पहुंचकर आग बुझाई। रिपोर्ट के अनुसार, किसान बख्शीश सिंह के खेत में पराली जलाए जाने का मामला सामने आया था। अधिकारियों ने संबंधित नियमों के अनुसार चालान, जुर्माना और राजस्व रिकॉर्ड में रेड एंट्री की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही।पराली जलाने से रोकने के लिए प्रशासन अब इसके आर्थिक उपयोग पर विशेष जोर दे रहा है। अधिकारियों के अनुसार, धान की पराली को बायोमास के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे एकत्र करके छोटे-छोटे पेलेट या अन्य ईंधन उत्पादों में बदला जा सकता है, जिनका उपयोग औद्योगिक बॉयलर, ईंट भट्ठों और ताप विद्युत संयंत्रों में किया जा सकता है।
24 अक्टूबर को CAQM की टीम ने अमृतसर में एक औद्योगिक परिसर का निरीक्षण किया था, जहां धान की पराली से तैयार पेलेट का इस्तेमाल बॉयलर में ईंधन के रूप में किया जा रहा है। अधिकारियों ने इस व्यवस्था को पराली के उत्पादक उपयोग का उदाहरण माना और ऐसे मॉडल का विस्तार करने की आवश्यकता बताई।आयोग ने निर्देश दिए कि जिन उद्योगों में तकनीकी रूप से संभव है, वहां पराली आधारित ईंधन का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों में नोडल अधिकारी नियुक्त करने और पराली के वास्तविक उपयोग की नियमित निगरानी करने पर जोर दिया गया है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, पराली को बायोमास में बदलने से किसानों और पर्यावरण दोनों को लाभ मिल सकता है। खेतों में पराली जलाने से धुआं और सूक्ष्म प्रदूषक कण वायुमंडल में फैलते हैं। इससे आसपास के इलाकों में वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है और सांस संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं। इसके अतिरिक्त आग के कारण मिट्टी में मौजूद उपयोगी सूक्ष्मजीवों और पोषक तत्वों को भी नुकसान पहुंच सकता है।इसके विपरीत पराली का वैज्ञानिक प्रबंधन मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और प्रदूषण कम करने में मददगार हो सकता है। किसान पराली को खेत में मिलाकर जैविक पदार्थ के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं खेत से बाहर एकत्र की गई पराली को ईंधन या औद्योगिक कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
पराली प्रबंधन के लिए बेलर, सुपर सीडर, हैप्पी सीडर और अन्य कृषि मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है। बेलर मशीन खेतों में बिखरी पराली को गठ्ठरों में बदल देती है। इसके बाद इन गठ्ठरों को वाहन के माध्यम से औद्योगिक इकाइयों या प्रसंस्करण केंद्रों तक पहुंचाया जा सकता है।हालांकि, छोटे किसानों के सामने इन मशीनों की उपलब्धता और किराये का खर्च एक चुनौती हो सकता है। इसी को देखते हुए प्रशासन को कस्टम हायरिंग सेंटरों, मशीनरी प्रदाताओं और किसानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं।
CAQM ने पंजाब के 18 जिलों में 1 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक विशेष निगरानी के लिए फ्लाइंग स्क्वॉड तैनात किए हैं। इनमें तरनतारन, अमृतसर, फिरोजपुर, बठिंडा, लुधियाना, पटियाला और अन्य जिले शामिल हैं। इन टीमों का उद्देश्य पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखना और स्थानीय अधिकारियों के साथ समन्वय बनाना है।प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसानों को पराली प्रबंधन के ऐसे विकल्प उपलब्ध कराना है, जो कम खर्चीले और आसानी से सुलभ हों। धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई के लिए समय सीमित होता है। इस कारण कई किसान खेत जल्दी साफ करने के लिए पराली जला देते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को समय पर मशीनें, पराली उठाने की सुविधा और उपयुक्त बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो पराली जलाने की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।फिलहाल तरनतारन प्रशासन पराली जलाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई के साथ जागरूकता अभियान और बायोमास आधारित समाधान को बढ़ावा दे रहा है। आने वाले दिनों में इस अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों को सुविधाएं कितनी प्रभावी तरीके से उपलब्ध कराई जाती हैं और खेतों में आग लगाने की घटनाओं में कितनी कमी आती है।