औपचारिक विलय से पहले ही PSPCL ने 108 निजी कर्मचारियों को किया एडजस्ट

Update: 2026-07-16 10:16 GMT

 चंडीगढ़। पंजाब के ऊर्जा क्षेत्र (Power Sector) से एक बड़ा और बेहद चर्चा का विषय बना प्रशासनिक मामला सामने आया है। पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) ने गोइंडवाल साहिब स्थित गुरु अमरदास थर्मल प्लांट (जीएटीपी) के औपचारिक विलय की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही एक बड़ा कदम उठा लिया है। पीएसपीसीएल प्रबंधन ने निजी प्रबंधन के समय से कार्यरत इंजीनियरों, अधिकारियों और तकनीकी व गैर-तकनीकी श्रेणी के कुल 108 कर्मचारियों के समायोजन (Adjustment) के लिए नए पदों को मंजूरी दे दी है। हालांकि, निगम के इस फैसले ने प्रशासनिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। औपचारिक विलय की कानूनी प्रक्रिया लंबित होने के बावजूद केवल निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) के प्रस्ताव के आधार पर इन पदों को स्वीकृति देने, उनके चयन, संख्या और तय किए जा रहे वेतनमान को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि को देखें तो पंजाब सरकार द्वारा पूर्व जीवीके (GVK) थर्मल प्लांट का आधिकारिक तौर पर अधिग्रहण किए जाने के बाद यह पूरी कवायद शुरू हुई थी। अधिग्रहण के बाद पीएसपीसीएल ने वहां निजी प्रबंधन के अधीन काम कर रहे कर्मचारियों का पूरा ब्योरा मांगा था। इसके जवाब में जीवीके प्रबंधन की ओर से कुल 108 कर्मचारियों की एक सूची सरकारी निगम को सौंपी गई थी। इस सूची को आधार बनाते हुए पीएसपीसीएल ने अपनी आंतरिक परिचालन जरूरतों (Operational Requirements) का हवाला दिया और उसी के अनुसार इन कर्मचारियों को सरकारी ढांचे में फिट करने के लिए पदों की एक नई संरचना (Post Structure) तैयार कर दी। निगम का दावा है कि इन कर्मचारियों का समायोजन उनके मौजूदा पद, योग्यता और पुराने कार्य अनुभव को ध्यान में रखकर किया जा रहा है ताकि प्लांट के कामकाज में कोई बाधा न आए।

लेकिन, बिजली विभाग के भीतर और प्रशासनिक विशेषज्ञों के बीच इस प्रक्रिया को लेकर भारी सुगबुगाहट और असंतोष देखा जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल इसके 'अधूरे विलय' को लेकर उठ रहा है। जानकारों का कहना है कि जब तक गुरु अमरदास थर्मल प्लांट का पीएसपीसीएल में कानूनी और औपचारिक रूप से पूरी तरह विलय नहीं हो जाता, तब तक इतने बड़े पैमाने पर पदों को स्वीकृत करना और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को सरकारी बिजली निगम के कैडर में शामिल करना सेवा नियमों के खिलाफ है। इसके अलावा, पदों की चयन प्रक्रिया को लेकर भी पारदर्शिता पर उंगलियां उठ रही हैं। आलोचकों का सवाल है कि किस मापदंड के तहत इन खास 108 पदों की पहचान की गई और क्या इसमें निगम के मौजूदा वरिष्ठता नियमों (Seniority Rules) का पूरी तरह पालन किया गया है?

दूसरा बड़ा विवाद इन कर्मचारियों के लिए तय किए जा रहे वेतनमान (Pay Scales) को लेकर है। पीएसपीसीएल के भीतर पहले से कार्यरत नियमित कर्मचारियों और यूनियनों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि निजी क्षेत्र से आने वाले इन कर्मचारियों के वेतन और भत्तों का निर्धारण किस आधार पर किया जा रहा है। यदि उन्हें सीधे तौर पर उच्च वेतनमान या वरिष्ठता का लाभ दिया जाता है, तो इससे निगम के पुराने और समर्पित कर्मचारियों के हितों पर सीधा असर पड़ेगा। केवल एक बोर्ड प्रस्ताव के जरिए इतने महत्वपूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक बदलावों को लागू करने की जल्दबाजी पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं, जबकि आमतौर पर ऐसे संवेदनशील मामलों में पंजाब सरकार के वित्त विभाग और कैबिनेट की मंजूरी की आवश्यकता होती है।

फिलहाल, इस फैसले के बाद पीएसपीसीएल प्रबंधन और बिजली विभाग के आला अधिकारी रक्षात्मक मुद्रा में हैं। प्रबंधन का तर्क है कि थर्मल प्लांट को सुचारू रूप से चलाने और बिजली उत्पादन को प्रभावित होने से बचाने के लिए वहां के अनुभवी तकनीकी स्टाफ को तुरंत सेवा में बनाए रखना बेहद जरूरी था। अधिकारियों के मुताबिक, यह समायोजन पूरी तरह से तकनीकी आवश्यकताओं पर आधारित है और इसे अंतिम विलय प्रक्रिया के एक हिस्से के रूप में ही देखा जाना चाहिए। बहरहाल, इस फैसले ने पंजाब के पावर सेक्टर में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पीएसपीसीएल प्रबंधन इन उठते सवालों और विरोध के सुरों के बीच इस समायोजन प्रक्रिया को सुचारू रूप से पूरा कर पाता है या फिर यह मामला किसी कानूनी या बड़े प्रशासनिक विवाद में तब्दील हो जाता है। 

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