चंडीगढ़। मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे Form 6 को लेकर विवाद तेज हो गया है। पंजाब कांग्रेस प्रमुख परगट सिंह ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की। उनकी यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी के बाद सामने आई, जिसमें शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने Form 6 के किसी संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी है।सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को SIR और Form 6 से जुड़े मामले की सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अदालत ने किसी संशोधित Form 6 को मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि संबंधित रिकॉर्ड सामने आने के बाद यह देखा जाएगा कि बदलाव किसने किए और उन्हें किस स्तर पर मंजूरी दी गई।
इसी घटनाक्रम को लेकर परगट सिंह ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरे मामले से संस्थागत प्रक्रियाओं को नुकसान पहुंचा है। सिंह ने मांग की कि CEC ज्ञानेश कुमार को जल्द से जल्द पद से हटाया जाए। उन्होंने उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करने की मांग भी की। यह परगट सिंह का राजनीतिक आरोप और मांग है; सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ऐसी किसी आपराधिक जिम्मेदारी का निष्कर्ष नहीं दिया है।सुप्रीम कोर्ट के सामने मौजूद मामला चुनाव आयोग के कामकाज और SIR से संबंधित कुछ फैसलों को लेकर दायर याचिकाओं से जुड़ा है। अदालत ने सोमवार को CEC ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से हटाने या उनके कामकाज पर रोक लगाने जैसा अंतरिम आदेश देने से इनकार किया। कोर्ट ने पहले संबंधित पक्षों का जवाब और आधिकारिक रिकॉर्ड देखने की बात कही है।
विवाद के केंद्र में Form 6 और उसके साथ जोड़ी गई एक अतिरिक्त घोषणा है। Form 6 का इस्तेमाल पात्र नागरिकों द्वारा मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। SIR के दौरान सामने आए नए घोषणा-पत्र में आवेदकों से यह जानकारी देने की व्यवस्था की गई कि उनका या उनके माता-पिता का नाम पिछले SIR से संबंधित मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं। इसी अतिरिक्त व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए गए हैं।इस मामले में चुनाव आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। आयोग ने पहले कहा था कि SIR के लिए Form 6 के साथ संलग्न घोषणा को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन प्राप्त है। दूसरी ओर, सोमवार की सुनवाई में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि किसी संशोधित Form 6 को अदालत ने मंजूरी नहीं दी है। अब सुप्रीम कोर्ट संबंधित रिकॉर्ड देखकर इस बात की पड़ताल करना चाहता है कि बदलाव किस स्तर पर किए गए थे।
हालांकि विवाद में एक अहम अंतर भी सामने आया है। चुनाव आयोग का पक्ष रहा है कि मूल Form 6 में बदलाव नहीं किया गया, बल्कि SIR के लिए उसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। इसलिए अब विवाद इस बात पर भी केंद्रित है कि अतिरिक्त घोषणा को लागू करने की प्रक्रिया क्या थी और क्या इसके लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया।मामले में दाखिल याचिकाओं में चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद लिए गए। हालांकि ये फिलहाल याचिकाकर्ताओं के आरोप हैं और सुप्रीम कोर्ट ने इन पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत ने साफ किया है कि आधिकारिक रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के जवाब देखने के बाद ही इन मुद्दों पर विचार किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान तत्काल राहत के तौर पर CEC को उनके पद के कामकाज से रोकने की मांग भी उठी। कोर्ट ने इस पर सवाल किया कि ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग का कामकाज और चुनावी प्रक्रिया किस तरह संचालित होगी। अदालत ने कहा कि पहले तथ्यों और रिकॉर्ड की पुष्टि जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए मामले को इसी तरह की दूसरी याचिका के साथ जोड़ दिया है।परगट सिंह ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद इस पूरे मामले को संस्थाओं की कार्यप्रणाली से जोड़ते हुए CEC के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उनकी टिप्पणी से Form 6 विवाद पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को CEC के खिलाफ दोषसिद्धि या Form 6 से जुड़े सभी फैसलों को अवैध घोषित करने के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालत ने अभी संबंधित रिकॉर्ड की जांच करने और सभी पक्षों को सुनने की प्रक्रिया शुरू की है। आगे की सुनवाई में चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, Form 6 से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा और उसे लागू करने के अधिकार जैसे मुद्दों पर स्थिति अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।