हाईकोर्ट का मानवीय फैसला, उम्रकैद काट रहे पिता को मिली राहत
बच्चे की चिकित्सा जरूरतों को मिली अहमियत
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने गंभीर आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित बेटे की देखभाल के लिए उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी को आठ सप्ताह की पैरोल देने का आदेश दिया है। अदालत ने मामले में बच्चे की चिकित्सा जरूरतों और पारिवारिक परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना। हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल के अनुरोध पर विचार करते समय केवल अपराध की गंभीरता को देखना पर्याप्त नहीं है। आश्रित बच्चे की स्थिति और देखभाल की आवश्यकता का भी उचित मूल्यांकन होना चाहिए। अदालत ने लुधियाना के जिला मजिस्ट्रेट का आवेदन खारिज करने वाला आदेश रद्द कर दिया।
लुधियाना निवासी याचिकाकर्ता का बेटा ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित है। मामले में प्रस्तुत चिकित्सा विवरण के अनुसार, बच्चे को 50 प्रतिशत दिव्यांगता प्रमाणित की गई है। पिता ने उसकी देखभाल में सहयोग के लिए अस्थायी रिहाई मांगी थी। जिला प्रशासन से राहत नहीं मिलने पर उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई में सवाल यह था कि बच्चे की प्रमाणित चिकित्सा स्थिति और पिता की मौजूदगी की जरूरत को पैरोल आवेदन में कितनी गंभीरता से परखा गया।
जिला मजिस्ट्रेट ने 21 मई को पैरोल का अनुरोध खारिज किया था। प्रशासन ने इसके लिए याचिकाकर्ता के गंभीर अपराध में दोषी होने और एनडीपीएस कानून के तहत एक अन्य मामले में आरोपी होने का हवाला दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि आदेश में बच्चे की बीमारी और देखभाल संबंधी परिस्थितियों का पर्याप्त आकलन नहीं हुआ। अदालत के सामने प्रस्तुत चिकित्सा सामग्री को निर्णय लेते समय अपेक्षित महत्व नहीं दिए जाने की बात भी सामने आई।
न्यायमूर्ति अनूप चितकारा और न्यायमूर्ति हरमीत सिंह देओल की खंडपीठ ने स्वास्थ्य सेवाओं की व्यावहारिक परिस्थितियों पर भी विचार किया। अदालत ने उल्लेख किया कि सभी अस्पतालों में मरीजों की सहायता के लिए समान संसाधन उपलब्ध नहीं होते। कई संस्थानों में परिचारकों और सहायक कर्मचारियों की सीमित उपलब्धता के कारण परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी मरीज को कितनी सहायता चाहिए, यह उसकी बीमारी, अस्पताल की सुविधाओं और उपलब्ध कर्मचारियों पर निर्भर करता है।
अदालत ने इस धारणा को उचित नहीं माना कि अस्पताल में भर्ती होने पर बच्चे को परिवार की सहायता की जरूरत नहीं रहेगी। उसके अनुसार, चिकित्सा संस्थान में उपचार मिलना और परिजन की देखभाल उपलब्ध होना अलग आवश्यकताएं हो सकती हैं। बच्चे की स्थिति में निरंतर अभिभावकीय सहयोग की जरूरत को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इस मामले में पिता की उपस्थिति के अनुरोध को केवल सामान्य आशंकाओं के आधार पर खारिज करने के बजाय उपलब्ध तथ्यों के साथ परखना आवश्यक था। खंडपीठ के सामने याचिकाकर्ता का यह पक्ष भी था कि बच्चे की देखभाल के लिए दूसरा व्यक्ति उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासनिक आदेश में इस दावे की वास्तविकता की पर्याप्त जांच नहीं की गई थी। अदालत ने बच्चे की जरूरतों और अस्थायी रिहाई से जुड़े संभावित जोखिमों को साथ रखकर मूल्यांकन करने पर जोर दिया। इससे स्पष्ट होता है कि निर्णय में पारिवारिक परिस्थिति के सत्यापन और सुरक्षा संबंधी चिंताओं, दोनों का महत्व था।
दूसरे आपराधिक मामले में आरोपी होने के आधार पर उठाई गई आपत्ति पर भी हाईकोर्ट ने विचार किया। अदालत के मुताबिक, केवल किसी अन्य मामले का लंबित होना यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति पैरोल मिलने पर फरार होगा या उसका दुरुपयोग करेगा। प्रशासनिक आदेश में इस आशंका को याचिकाकर्ता के आचरण अथवा किसी विशिष्ट सामग्री से जोड़ने वाला स्पष्ट आधार नहीं बताया गया था। इसलिए लंबित आरोप को अपने आप में राहत रोकने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया।
इस फैसले का केंद्र बच्चे की देखभाल की तत्काल आवश्यकता है। पिता को दी गई राहत आठ सप्ताह की अस्थायी रिहाई से संबंधित है। इसे उम्रकैद की सजा समाप्त होने या दोषसिद्धि बदलने के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। मामले में अदालत ने जिस प्रशासनिक निर्णय की समीक्षा की, वह पैरोल का आवेदन खारिज करने वाला आदेश था। इसलिए खबर का महत्वपूर्ण पहलू सजा पर पुनर्विचार के बजाय बच्चे की परिस्थितियों के आधार पर अस्थायी राहत मिलना है। फैसला यह भी सामने लाता है कि किसी आवेदन पर कारण दर्ज करना कितना जरूरी है। यदि प्रशासन को रिहाई से कोई विशेष खतरा दिखाई देता है, तो उस आशंका का संबंध उपलब्ध सामग्री से स्पष्ट होना चाहिए। इसी तरह आवेदक की ओर से प्रस्तुत बीमारी या पारिवारिक जरूरत के दावे को भी जांचना आवश्यक है। इस मामले में हाईकोर्ट ने बच्चे की चिकित्सा जरूरतों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं होने को महत्वपूर्ण कमी माना।
अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हुए आठ सप्ताह की पैरोल मंजूर की। इस राहत से पिता को गंभीर बीमारी से जूझ रहे बेटे की देखभाल में सहयोग का अवसर मिलेगा। उपलब्ध रिपोर्टों में विस्तृत रिहाई शर्तों, जमानती बंधपत्र या रिपोर्टिंग व्यवस्था का पूरा विवरण नहीं दिया गया है। आदेश का प्रमुख संदेश यही है कि पैरोल संबंधी निर्णय में प्रमाणित चिकित्सा जरूरतों, पारिवारिक परिस्थितियों और वास्तविक जोखिमों का संतुलित आकलन होना चाहिए।