पंजाब: लगातार बढ़ता भूजल संकट अब बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। राज्य को भूजल के ‘रेड जोन’ से बाहर निकालने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन ताजा आंकड़े स्थिति की गंभीरता को उजागर कर रहे हैं। राज्य के 153 भूजल आकलन ब्लॉकों में से 111 ब्लॉक अत्यधिक दोहन यानी ओवर-एक्सप्लाइटेड श्रेणी में पहुंच चुके हैं। वहीं पंजाब अपनी उपलब्ध भूजल क्षमता से करीब 56 प्रतिशत अधिक पानी निकाल रहा है।
केंद्र सरकार की ओर से भूजल स्थिति को लेकर जारी जानकारी के अनुसार, पंजाब में सिंचाई के लिए ट्यूबवेलों पर अत्यधिक निर्भरता और धान जैसी ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसलों की खेती भूजल स्तर पर लगातार दबाव बढ़ा रही है। राज्य में भूजल पुनर्भरण की स्थिति बेहतर होने के बावजूद पानी की खपत लगातार बढ़ने से संकट गहरा रहा है।
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार पंजाब का वार्षिक भूजल पुनर्भरण 18.60 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है, जबकि दोहन योग्य भूजल संसाधन 16.80 बीसीएम आंका गया है। इसके बावजूद कई इलाकों में भूजल निकासी तय सीमा से काफी अधिक हो चुकी है।
जिला स्तर पर देखें तो संगरूर में भूजल दोहन सबसे ज्यादा 309.99 प्रतिशत दर्ज किया गया है। इसके बाद मलेरकोटला में 301.93 प्रतिशत, जालंधर में 281.17 प्रतिशत, कपूरथला में 242.96 प्रतिशत और मोगा में 233.09 प्रतिशत भूजल का इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा बरनाला में 219.36 प्रतिशत, पटियाला में 208.53 प्रतिशत, तरनतारन में 202.49 प्रतिशत, लुधियाना में 194.65 प्रतिशत और फतेहगढ़ साहिब में 182.13 प्रतिशत दोहन दर्ज किया गया है।
हालांकि कुछ जिलों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। श्री मुक्तसर साहिब में भूजल दोहन 27.81 प्रतिशत, पठानकोट में 41.05 प्रतिशत, फाजिल्का में 65.18 प्रतिशत और रूपनगर में 92.80 प्रतिशत दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में नहरी सिंचाई की सुविधा बेहतर है और किसानों ने कम पानी वाली फसलों को अपनाया है, वहां भूजल पर दबाव कम हुआ है।
भूजल संकट से निपटने के लिए पंजाब सरकार ने फसल विविधीकरण पर विशेष जोर दिया है। किसानों को धान की जगह मक्का, कपास, दालें और तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य धान की खेती पर निर्भरता कम करना और पानी की बचत को बढ़ावा देना है।
इसके अलावा राज्य में सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं। करीब 7,200 करोड़ रुपये की लागत से पुरानी नहरों और रजवाहों के आधुनिकीकरण का काम किया गया है। इससे कई क्षेत्रों में लंबे समय बाद नहरी पानी खेतों तक पहुंचने लगा है और ट्यूबवेलों पर निर्भरता कम करने की उम्मीद बढ़ी है।
रूपनगर समेत कई इलाकों में लिफ्ट इरिगेशन परियोजनाओं पर भी काम किया जा रहा है। करीब 650 करोड़ रुपये की लागत वाली इन योजनाओं के जरिए सतलुज और स्वां नदी के पानी को खेतों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही भूमिगत पाइपलाइन, ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना के तहत किसानों को माइक्रो इरिगेशन अपनाने के लिए सहायता दी जा रही है, ताकि कम पानी में अधिक उत्पादन लिया जा सके। भूजल के बेहतर प्रबंधन और निगरानी के लिए पंजाब वाटर रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी का गठन भी किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब में भूजल संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं होगा। इसके लिए किसानों, प्रशासन और आम लोगों को मिलकर पानी बचाने की दिशा में काम करना होगा। यदि समय रहते खेती के तरीके और पानी के इस्तेमाल में बदलाव नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में राज्य के कई हिस्सों में जल संकट और गंभीर हो सकता है।