ओडिशा : चर्चित स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं। करीब 18 साल पुराने इस मामले में माओवादी नेता डुन्ना केशव राव उर्फ आजाद को अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। इस फैसले के बाद एक बार फिर हत्याकांड, जांच प्रक्रिया और कथित रूप से गायब जांच रिपोर्ट को लेकर बहस तेज हो गई है।
कौन थे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती?
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती एक हिंदू संत और विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़े प्रमुख धार्मिक नेता थे। उनका जन्म 1926 में ओडिशा में हुआ था। उन्होंने लंबे समय तक आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों के जरिए काम किया।
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ओडिशा के कंधमाल जिले में विशेष रूप से सक्रिय थे। वह आदिवासी समुदायों के बीच शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और धार्मिक गतिविधियों को लेकर काम करते थे। उनके समर्थक उन्हें जनजातीय समाज के उत्थान के लिए काम करने वाला संत मानते थे।
2008 में हुई थी हत्या
23 अगस्त 2008 को ओडिशा के कंधमाल जिले के जलेसपेटा आश्रम में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद पूरे ओडिशा में तनाव फैल गया था और कंधमाल हिंसा ने बड़े विवाद का रूप ले लिया था।
पुलिस जांच में इस हत्याकांड के पीछे माओवादी संगठन की भूमिका का दावा किया गया था। जांच एजेंसियों ने कई लोगों को आरोपी बनाया और कुछ आरोपियों को अदालत ने दोषी भी ठहराया था।
माओवादी नेता आजाद पर था आरोप
इस मामले में माओवादी नेता डुन्ना केशव राव उर्फ आजाद को मुख्य आरोपियों में शामिल किया गया था। वह लंबे समय तक जेल में रहा। हाल ही में ओडिशा की विशेष अदालत ने उसे हत्या के आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ पर्याप्त और ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। गंभीर अपराध होने के बावजूद दोष साबित करने के लिए मजबूत साक्ष्य जरूरी होते हैं।
15 साल जेल में रहने के बाद रिहाई
माओवादी नेता आजाद 2011 में आंध्र प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने के बाद गिरफ्तार हुआ था। इसके बाद वह लंबे समय तक जेल में रहा। अदालत से बरी होने के बाद उसकी रिहाई हुई।
इस फैसले के बाद पीड़ित पक्ष और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के समर्थकों ने जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पूरे मामले की सच्चाई सामने आनी चाहिए और सभी दोषियों तक पहुंचना जरूरी है।
जांच रिपोर्ट गुम होने का विवाद
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड से जुड़ी जांच आयोग की रिपोर्ट के कथित रूप से गायब होने को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार, जांच आयोग की कुछ रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है, जिसके बाद उन्हें खोजने और मामले की जांच की मांग उठी है।
इस मामले को लेकर मांग की जा रही है कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए ताकि लोगों के सामने पूरी जानकारी आ सके। समर्थकों का कहना है कि रिपोर्ट सामने आने से लंबे समय से चले आ रहे सवालों के जवाब मिल सकते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड केवल एक हत्या का मामला नहीं रहा, बल्कि यह ओडिशा की राजनीति, सामाजिक तनाव और सुरक्षा व्यवस्था से भी जुड़ा रहा है। घटना के बाद कंधमाल में हुए दंगों ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया था।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में अंतिम फैसला सबूतों के आधार पर होता है। यदि जांच में पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलते हैं तो अदालत आरोपी को बरी कर सकती है।
आगे क्या?
आजाद के बरी होने के बाद अब इस मामले में जांच और रिपोर्ट को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। समर्थक जहां मामले की दोबारा समीक्षा और पारदर्शी जांच की मांग कर रहे हैं, वहीं कानूनी प्रक्रिया अपने स्तर पर आगे बढ़ रही है।
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड आज भी ओडिशा के सबसे चर्चित मामलों में शामिल है। वर्षों बाद भी इस मामले से जुड़े कई सवाल लोगों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं।