नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा के चर्चित 2001 ध्रुबा प्रधान हत्याकांड में दोषी ठहराए गए चार लोगों को बरी कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों की संलिप्तता को प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर साबित करने में विफल रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मामले में पेश किए गए सबूतों में कई महत्वपूर्ण कमियां थीं। अदालत ने चश्मदीद गवाहों के बयानों में विसंगतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि घनी अंधेरी रात में कथित हमलावरों की पहचान को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।

यह फैसला 18 सितंबर 2026 को ‘कार्तिका उर्फ कीर्तन उर्फ कीर्तन चरण जेना और अन्य बनाम ओडिशा राज्य’ मामले में सुनाया गया।

हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटा

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने ओडिशा हाई कोर्ट और निचली अदालत के फैसलों को रद्द कर दिया।

पीठ ने चारों अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए अभियोजन पक्ष को आरोपों को संदेह से परे साबित करना होता है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हो पाया।

14 मई 2001 की घटना

यह मामला 14 मई 2001 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना वाले दिन एक आरोपी शाम करीब 4 बजे शिकायतकर्ता के घर पहुंचा था और कथित तौर पर ध्रुबा प्रधान को जान से मारने की धमकी दी थी।

अभियोजन के मुताबिक, उसी दिन शाम बाद हथियारों से लैस एक समूह ने कथित तौर पर ध्रुबा प्रधान को तलाशा। आरोप था कि मोटरसाइकिल से जा रहे प्रधान को रास्ते में रोका गया और उन पर हमला किया गया।

आरोपों के अनुसार, हमलावरों ने हथियारों और पत्थरों से हमला किया तथा बाद में उनकी मोटरसाइकिल को तालाब में फेंक दिया।

पहचान और गवाही पर उठे सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने चश्मदीद गवाहों के बयानों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोप साबित करने का प्रयास किया था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों के बयानों में मौजूद अंतर और परिस्थितियों को देखते हुए उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।

अदालत ने कहा कि घटना कथित रूप से अंधेरे समय में हुई थी और ऐसी स्थिति में आरोपियों की पहचान को पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।

सबूतों की कमी का दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई मजबूत प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे चारों आरोपियों की भूमिका स्पष्ट रूप से साबित हो सके।

पीठ ने कहा कि जब मामले में संदेह बना रहता है तो उसका लाभ आरोपियों को दिया जाना आवश्यक है।

लंबी कानूनी लड़ाई का अंत

ध्रुबा प्रधान हत्याकांड में आरोपियों को दोषी ठहराए जाने के बाद मामला हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। करीब 25 साल पुराने इस मामले में अब शीर्ष अदालत के फैसले के बाद चारों आरोपियों को राहत मिली है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निचली अदालतों और हाई कोर्ट के पूर्व आदेश प्रभावहीन हो गए हैं।

आपराधिक मामलों में सबूतों की अहमियत

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए मजबूत और भरोसेमंद साक्ष्यों की जरूरत होती है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि आरोपों को प्रमाणित करने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ओडिशा के इस पुराने हत्याकांड में चारों दोषियों को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने अभियोजन पक्ष की कमजोरियों को देखते हुए उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

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