ओडिशा: आगामी पंचायत और नगर निकाय चुनावों से पहले पिछड़ा वर्ग (OBC/SEBC) आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार पर अब स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़ा वर्ग को राजनीतिक आरक्षण देने का दबाव बढ़ता जा रहा है। लाखों OBC मतदाताओं की नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है।
हाल ही में राज्य सरकार ने शिक्षा क्षेत्र में SEBC वर्ग को 11.25 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला लिया था, लेकिन पंचायत और शहरी निकाय चुनावों में राजनीतिक आरक्षण को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आई है। यही वजह है कि विपक्षी दल सरकार पर सवाल उठा रहे हैं और पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है।
दरअसल, वर्ष 2022 में तत्कालीन बीजद सरकार ने पंचायत और नगर निकाय चुनावों में OBC वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी। हालांकि यह मामला अदालत पहुंच गया था और कानूनी अड़चनों के कारण सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा था। इसके बावजूद बीजद ने चुनावों में पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में टिकट देकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की थी।
अब राज्य में सत्ता परिवर्तन हो चुका है और भाजपा सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह आगामी चुनावों से पहले OBC आरक्षण लागू करने की दिशा में क्या कदम उठाती है। पंचायत और नगर निकाय चुनाव अगले वर्ष अप्रैल-मई में प्रस्तावित हैं, ऐसे में राजनीतिक दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं।
हाल ही में राज्य सरकार ने 35 नई अधिसूचित क्षेत्र परिषदों (NAC) और नगरपालिकाओं के अध्यक्ष पदों के साथ-साथ पुरी और संबलपुर नगर निगमों के मेयर पदों के लिए आरक्षण की प्रारंभिक सूची जारी की थी। इस सूची में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया, लेकिन OBC वर्ग के लिए कोई आरक्षण नहीं दिया गया। इसके बाद विपक्ष ने सरकार पर पिछड़ा वर्ग की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
वर्तमान नियमों के अनुसार ओडिशा में स्थानीय निकायों में SC वर्ग के लिए 16.25 प्रतिशत और ST वर्ग के लिए 22.5 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। इसके अलावा महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीटों का प्रावधान है। यदि सरकार OBC आरक्षण लागू करना चाहती है तो उसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ‘ट्रिपल टेस्ट’ प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
ट्रिपल टेस्ट के तहत सरकार को एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग बनाना होगा। आयोग सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करेगा। इसके आधार पर यह तय किया जाएगा कि किन क्षेत्रों में OBC वर्ग के लिए कितनी सीटें आरक्षित की जानी चाहिए। साथ ही कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।
सूत्रों के अनुसार राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत और नगर निकाय चुनावों की तैयारियां शुरू कर दी हैं। जिला परिषद, पंचायत समिति, सरपंच, वार्ड सदस्य, मेयर और पार्षद पदों के आरक्षण निर्धारण के लिए जिलों से रिपोर्ट मांगी गई है। कई क्षेत्रों में सर्वेक्षण का काम भी शुरू हो चुका है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ओडिशा में पिछड़ा वर्ग एक बड़ा मतदाता समूह है और चुनावी राजनीति में इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में भाजपा और बीजद दोनों दल इस मुद्दे को लेकर अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।
पूर्व में गठित न्यायमूर्ति रघुनाथ बिस्वाल आयोग ने राज्य में पिछड़ा वर्ग की आबादी करीब 39 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया था, लेकिन यह रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है। इसी वजह से OBC आरक्षण को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा सरकार चुनाव से पहले ट्रिपल टेस्ट प्रक्रिया पूरी कर OBC राजनीतिक आरक्षण लागू कर पाएगी या फिर पिछड़ा वर्ग को एक बार फिर आरक्षण के लिए इंतजार करना पड़ेगा। फिलहाल इस मुद्दे ने ओडिशा की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और चुनाव से पहले इसका असर देखने को मिल सकता है।