कटक: ओडिशा हाई कोर्ट ने राज्य भर के स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटीज़ और दूसरे एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स में मेंटल हेल्थ अवेयरनेस को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदमों पर ओडिशा सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।

चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस चित्तरंजन डैश की डिवीजन बेंच ने कटक के एसके साबिर अली और राबेया तबस्सुम और भुवनेश्वर की सरिता बारपांडा की ओर से दायर PIL पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह इस मामले में उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए तीन हफ़्ते के अंदर हलफनामा (affidavit) दाखिल करे।

बेंच ने कहा कि PIL में एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स में मेंटल हेल्थ अवेयरनेस के व्यापक प्रोग्राम की ज़रूरत पर गंभीर चिंता जताई गई है। बेंच ने यह भी कहा कि हाल की रिपोर्ट्स से पता चलता है कि कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनसे स्टूडेंट्स और समाज के दूसरे वर्गों की मेंटल वेलनेस को लेकर चिंता पैदा हुई है।

बेंच ने कहा, "सरकार इस मामले में कोई उदासीन रवैया नहीं अपना सकती।" साथ ही, बेंच ने मामले को 15 अक्टूबर को सुनवाई के लिए लिस्ट करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ताओं का पक्ष रख रहे वकील अफराज़ सुहैल ने मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की और आरोप लगाया कि राज्य की मेंटल हेल्थकेयर सिस्टम में अभी भी कमियां हैं।

PIL में पर्याप्त रिहैबिलिटेशन इंफ्रास्ट्रक्चर, काम करने वाले वैधानिक प्राधिकरणों और मेंटल हेल्थ रिव्यू बोर्ड, अवेयरनेस प्रोग्राम, जमीनी स्तर के हेल्थकेयर इंस्टीट्यूट्स में स्पेशलाइज़्ड स्टाफ और एक्ट को लागू करने के लिए राज्य के उचित नियमों की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया।

याचिका के अनुसार, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में ओडिशा में आत्महत्या के 5,791 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 3,287 मामले, यानी 56.8 प्रतिशत, पारिवारिक समस्याओं के कारण थे।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ये आंकड़े बताते हैं कि मेंटल हेल्थ को बढ़ावा देने, आत्महत्या रोकने के उपाय करने, काउंसलिंग और साइकोसोशल इंटरवेंशन की ज़रूरत है, खासकर युवाओं के लिए।

PIL में राज्य में रिहैबिलिटेशन सुविधाओं की भारी कमी का भी ज़िक्र किया गया। इसमें दावा किया गया कि ओडिशा में मानसिक बीमारी वाले लोगों के लिए केवल एक सरकारी रिहैबिलिटेशन सेंटर है, जो SCB मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में स्थित है और जिसकी क्षमता 150 लोगों की है। बाकी ज़िलों में कोई डेडिकेटेड रिहैबिलिटेशन सेंटर नहीं है।

इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि ज़्यादातर PHC और CHC में क्वालिफाइड मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल या मानसिक बीमारियों का पता लगाने और उनका इलाज करने के लिए ज़रूरी जानकारी रखने वाले स्टाफ की कमी है, जिससे जमीनी स्तर पर समय पर इलाज नहीं मिल पाता है।

याचिका में मेंटल हेल्थ रिव्यू बोर्ड को लेकर भी चिंता जताई गई। हालांकि 2021 में सभी ज़िलों में ऐसे बोर्ड बनाए गए थे, लेकिन याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ये शुरू से ही निष्क्रिय रहे हैं। एक्ट के तहत ज़रूरी होने के बावजूद, इनके सदस्यों के पुनर्गठन या नवीनीकरण के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।

 

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