नागालैंड: नागालैंड विश्वविद्यालय के लुमामी परिसर में जैव विविधता संरक्षण और जलवायु अनुकूलन क्षमता पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। 6 और 7 अक्टूबर 2026 को आयोजित इस सम्मेलन में पूर्वोत्तर भारत की पर्यावरणीय चुनौतियों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को लेकर विशेषज्ञों ने विचार साझा किए। सम्मेलन का विषय 'स्थायी भविष्य के लिए रणनीतियां' रखा गया था। सम्मेलन का आयोजन विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग ने नागालैंड राज्य जैव विविधता बोर्ड से जुड़ी परियोजना और अन्य सहयोगी संस्थाओं के साथ किया। इसमें शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, पर्यावरण विशेषज्ञों और विद्यार्थियों ने भाग लिया।
सम्मेलन के संयोजक प्रोफेसर आशुतोष त्रिपाठी ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत समृद्ध वन क्षेत्रों, विविध पारिस्थितिकी तंत्र और पारंपरिक ज्ञान के लिए जाना जाता है। हालांकि जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता में कमी जैसी चुनौतियां प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा रही हैं।
उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, सरकारी नीतियों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को एक साथ जोड़ने की आवश्यकता बताई।
कार्यक्रम का उद्घाटन आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर पीके मिश्रा ने किया। उन्होंने पर्यावरणीय क्षरण पर चिंता व्यक्त करते हुए प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग और संरक्षण पर जोर दिया। नागालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जेके पटनायक ने कहा कि विकास और आधुनिकीकरण के साथ प्राकृतिक आपदाओं की चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। उन्होंने भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए पर्यावरणीय परिवर्तनों का वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक बताया।
सम्मेलन में कुल 91 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें 14 विशेषज्ञ, 67 पंजीकृत प्रतिनिधि और विश्वविद्यालय के 10 संकाय सदस्य शामिल थे। विशेषज्ञों ने स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की रणनीति विकसित करने पर जोर दिया।
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