मिजोरम: मिजोरम के स्कूल शिक्षा निदेशालय ने राज्य भर के स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे स्कूल परिसर में छात्रों की वीडियो या फोटो लेने से बचें। साथ ही, ऐसी तस्वीरें या वीडियो साझा न करने की चेतावनी दी है, जिससे छात्रों की निजता, सम्मान या भलाई को नुकसान पहुँच सकता है।
26 अक्टूबर को जारी एक सर्कुलर में, निदेशालय ने कहा है कि स्कूल परिसर में (चाहे क्लासरूम हो या कोई अन्य जगह) छात्रों की वीडियो या फोटो लेने से बचना चाहिए। हालांकि, स्कूल के कार्यक्रमों, सह-पाठ्यचर्या (co-curricular) और पाठ्येतर (extracurricular) गतिविधियों, या पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी जरूरी गतिविधियों के दौरान ऐसा किया जा सकता है।
यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब सोशल मीडिया पर छात्रों से जुड़ी ऐसी सामग्री के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं, जिसे सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाया जाना चाहिए।
सर्कुलर में खास तौर पर ऐसी वीडियो या फोटो लेने से मना किया गया है, जिससे छात्रों को "शर्मिंदगी, अपमान या परेशानी" हो सकती है। खासकर तब, जब ऐसी फुटेज को बाद में फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, यूट्यूब, X (ट्विटर) और थ्रेड्स जैसे प्लेटफॉर्म पर शेयर किया जा सकता हो।
'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023' और 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025' का हवाला देते हुए, निदेशालय ने कहा है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों का पर्सनल डेटा (जिसमें उनकी पहचान बताने वाली फोटो और वीडियो भी शामिल हैं) इस्तेमाल करने से पहले, उनके माता-पिता या कानूनी अभिभावक से स्पष्ट सहमति लेना जरूरी है। यह नियम संबंधित प्रावधानों और छूटों के लागू होने के बाद प्रभावी होगा।
स्कूलों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि छात्रों की फोटो, वीडियो और अन्य निजी जानकारी को बिना उचित अनुमति और कानूनों का पालन किए न तो इकट्ठा किया जाए, न इस्तेमाल किया जाए और न ही कहीं और साझा किया जाए।
सर्कुलर में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर नियमों का उल्लंघन होता है और वह अपराध की श्रेणी में आता है, तो 'सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000' (Information Technology Act, 2000) और 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012' (POCSO Act) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इसमें खास तौर पर POCSO एक्ट की धारा 23 का जिक्र किया गया है, जो इस कानून के दायरे में आने वाले मामलों में बच्चे की पहचान उजागर करने से संबंधित है।
निदेशालय ने शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों से यह भी कहा है कि वे सोशल मीडिया पर किसी खास छात्र की फोटो या वीडियो बार-बार पोस्ट करने से बचें। हालांकि, इसमें कुछ अपवाद भी हैं, जैसे छात्रों की उपलब्धियों से जुड़ी सामग्री, आधिकारिक कार्यक्रमों या खास गतिविधियों में उनकी भागीदारी, और आधिकारिक रिपोर्ट के लिए जरूरी दस्तावेज।
शिक्षकों से यह भी कहा गया है कि वे अपने निजी या आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से छात्रों और स्कूल की गतिविधियों से जुड़ी कोई भी सामग्री पोस्ट या शेयर करते समय सावधानी बरतें। सर्कुलर में कहा गया है कि ऐसा कोई भी कंटेंट प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए जिससे स्कूल की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे, उसकी यूनिफॉर्म की बदनामी हो, या छात्रों या स्टाफ की गरिमा, निजता और व्यक्तिगत भलाई पर आंच आए। आपराधिक धमकी या मानहानि की श्रेणी में आने वाले कंटेंट के मामले में, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की क्रमशः धारा 351 और 356 के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
इसके अलावा, स्कूलों को निर्देश दिया गया है कि वे कैंपस में छात्रों द्वारा मोबाइल फोन, स्मार्टवॉच, टैबलेट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के इस्तेमाल को सीमित करने के लिए लिखित नीतियां बनाएं। कुछ विशेष और जायज मामलों में छूट दी जा सकती है, लेकिन इसके लिए पहले से अनुमति लेनी होगी और संबंधित शिक्षकों या स्टाफ की सीधी निगरानी में ही इनका इस्तेमाल किया जा सकेगा।
स्कूलों को छात्रों को सोशल मीडिया के जिम्मेदार इस्तेमाल, डिजिटल फुटप्रिंट और ऑनलाइन कंटेंट शेयर करने के संभावित परिणामों के बारे में भी जागरूक करना चाहिए।