CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मिजोरम कांग्रेस का प्रदर्शन, हटाने की उठी मांग
आइजोल: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर कांग्रेस का विरोध तेज हो गया है। कांग्रेस ने अपने सभी प्रदेश संगठनों को 25 सितंबर को चुनाव कार्यालयों तक विरोध मार्च आयोजित करने के निर्देश दिए हैं और ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की है। इसी राष्ट्रव्यापी अभियान के तहत पूर्वोत्तर के राज्यों में भी पार्टी विरोध प्रदर्शन कर रही है।
यह विवाद उस मीडिया रिपोर्ट के बाद तेज हुआ, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों ने पिछले करीब 10 महीनों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के आधार पर विपक्षी दलों ने आयोग के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव और SIR प्रक्रिया से जुड़े कुछ फैसलों की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए। पार्टी ने CEC को हटाने के साथ उनके कार्यकाल में लिए गए चुनाव और मतदाता सूची संबंधी निर्णयों की समीक्षा की मांग भी की है। ये कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
दूसरी ओर चुनाव आयोग ने रिपोर्टों में सामने आए आंतरिक मतभेदों को लेकर कहा है कि लिखित टिप्पणियां, सुझाव और अलग-अलग विचार संस्थागत विचार-विमर्श की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग का कहना है कि हाल के अंतिम आदेश सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और वाम दलों समेत कई विपक्षी दलों ने हालिया रिपोर्ट के बाद उनके इस्तीफे या पद से हटाने की मांग उठाई है। विपक्ष के कुछ नेताओं ने SIR प्रक्रिया रोकने और चुनाव आयोग के कामकाज की स्वतंत्र जांच की मांग भी की है।
कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक विपक्ष संसद के दोनों सदनों में CEC को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने की तैयारी भी कर रहा है। इसके लिए कानूनी विशेषज्ञों के साथ प्रस्ताव का मसौदा तैयार किए जाने की जानकारी सामने आई है।
फिलहाल विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े सवाल हैं। कांग्रेस इसे चुनावी पारदर्शिता से जोड़ रही है, जबकि चुनाव आयोग का पक्ष है कि आयोग के भीतर अलग-अलग राय सामने आना सामान्य प्रक्रिया है और अंतिम फैसले संस्थागत रूप से लिए जाते हैं।