मेघालय: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के 2 नवंबर के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर में यहाँ बारिश में 85 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। महीने के सामान्य स्तर 255 मिमी के मुकाबले यहाँ केवल 38.3 मिमी बारिश हुई। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान भी बारिश की कमी रही थी, और अब इस भारी कमी ने राज्य की जल सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
जून से सितंबर के बीच राज्य में 1,077.1 मिमी बारिश हुई, जबकि इस मौसम का सामान्य स्तर 2,695.3 मिमी है। यानी, चार महीने के मानसून सीजन के दौरान बारिश में 60 प्रतिशत की कमी रही।
जैसे-जैसे मानसून आगे बढ़ा, बारिश की कमी और गंभीर होती गई। जुलाई में मेघालय में 9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जो अगस्त में बढ़कर 38 प्रतिशत हो गई। IMD के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में राज्य में 581.6 मिमी के सामान्य स्तर के मुकाबले 359.7 मिमी बारिश हुई।
अक्टूबर की बारिश की रिपोर्ट राज्य के लिए चिंताजनक तस्वीर पेश करती है; सभी 11 जिलों में बारिश में 'बहुत अधिक कमी' (large deficient) दर्ज की गई है। यह कमी 74 से 93 प्रतिशत के बीच रही, जिससे पता चलता है कि बारिश की यह कमी कुछ चुनिंदा इलाकों तक सीमित न रहकर पूरे राज्य में व्यापक रूप से देखी गई।
ईस्ट जयंतिया हिल्स और नॉर्थ गारो हिल्स में सबसे अधिक, 92-92 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जबकि ईस्ट खासी हिल्स में 91 प्रतिशत की कमी रही। वेस्ट गारो हिल्स में 86 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, वहीं साउथ वेस्ट खासी हिल्स और वेस्ट खासी हिल्स में 84-84 प्रतिशत की कमी रही।
ईस्ट गारो हिल्स में 81 प्रतिशत और वेस्ट जयंतिया हिल्स में 80 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। री भोई और साउथ गारो हिल्स में 74-74 प्रतिशत की कमी रही, जबकि साउथ वेस्ट गारो हिल्स में 93 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
IMD के अनुसार, यदि बारिश में 60 से 99 प्रतिशत तक की कमी हो, तो उसे 'बहुत अधिक कमी' (large deficient) की श्रेणी में रखा जाता है।
लंबे समय से चली आ रही बारिश की इस कमी ने पीने के पानी की उपलब्धता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, खासकर इसलिए क्योंकि मेघालय के कई समुदाय अपनी दैनिक जरूरतों के लिए प्राकृतिक झरनों पर निर्भर हैं। मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा ने पहले ही यह स्वीकार किया है कि 'जल जीवन मिशन' के तहत कई परियोजनाओं को पानी की आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारण जल स्रोतों का सूखना या उनमें पानी की कमी होना, बारिश के पैटर्न में बदलाव और जलवायु संबंधी स्थितियां हैं।
एक पहाड़ी राज्य होने के नाते, मेघालय काफी हद तक प्राकृतिक झरनों (springs) पर निर्भर है। इनमें से कई स्रोत ऐसे हैं, जिन पर लंबे समय तक सामान्य से कम बारिश होने का बुरा असर पड़ सकता है। इन स्रोतों के कमजोर होने से पीने के पानी की भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करने के प्रयास और भी मुश्किल हो सकते हैं, खासकर मॉनसून के अलावा बाकी महीनों में।
जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (Public Health Engineering Department) ने प्राकृतिक झरनों के कमजोर होने को एक बड़ी चिंता के रूप में चिह्नित किया है। विभाग ने 70,000 से अधिक 'स्प्रिंगशेड' (झरनों वाले क्षेत्रों) में लगभग 55,000 झरनों की मैपिंग की है और पुनर्जीवित करने के लिए 785 महत्वपूर्ण जल स्रोतों की पहचान की है।
बारिश की कमी लगातार बढ़ती जा रही है, और साथ ही झरनों से निकलने वाले पानी की मात्रा में भी गिरावट आ रही है। इन चिंताओं के कारण अब इन जल स्रोतों को बचाने और उन्हें फिर से जीवित करने की आवश्यकता पर नए सिरे से ध्यान दिया जा रहा है।
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