इम्फाल: मणिपुर की स्वायत्त जिला परिषदों (एडीसी) के पूर्व सदस्यों ने खेमचंद के नेतृत्व वाली सरकार से लंबे समय से लंबित स्थानीय निकाय चुनाव कराने का आह्वान करते हुए कहा है कि निर्वाचित परिषदों के लंबे समय तक निलंबन ने पहाड़ी निवासियों को विकास के अवसरों और उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर दिया है।
पूर्व प्रतिनिधियों ने कहा कि देरी के कारण 15वें वित्त आयोग के अनुदान में 624 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कार्यशील जिला परिषदों के अभाव में व्यक्तिगत विधायक स्वतंत्र रूप से व्यापक पहाड़ी निर्वाचन क्षेत्रों की बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा आवश्यकताओं को संबोधित नहीं कर सकते हैं।
2020 में अंतिम निर्वाचित एडीसी सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद गतिरोध और तेज हो गया। राज्य सरकार ने बाद में परिषदों के प्रबंधन के लिए कार्यवाहक अध्यक्षों की नियुक्ति की। हालाँकि, गौहाटी उच्च न्यायालय ने मार्च 2024 में इन नियुक्तियों को अवैध घोषित कर दिया, जिसके बाद राज्यपाल ने उस वर्ष बाद में औपचारिक रूप से इन्हें रद्द कर दिया। सरकार ने तब परिषदों की देखरेख के लिए संबंधित उपायुक्तों को अस्थायी प्रशासक के रूप में नियुक्त किया।
चुनाव की नए सिरे से मांग मणिपुर विधान सभा की पहाड़ी क्षेत्र समिति (एचएसी) द्वारा 12 मार्च, 2026 को चुनाव कराने के लिए दूसरी सिफारिश जारी करने के बाद आई है। 2024 के अंत में की गई इसकी पिछली अपील पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। पूर्व पार्षदों ने विधायी निकाय की बार-बार सिफारिशों के बावजूद चुनाव प्रक्रिया शुरू करने में विफल रहने के लिए सरकार की आलोचना की है।
वर्तमान प्रशासनिक शून्यता ने मणिपुर के निर्वाचित जिला परिषद शासन में लंबे समय तक रुकावटों के इतिहास पर चिंताओं को पुनर्जीवित कर दिया है। 1988 से 2010 तक चुनाव निलंबित रहे, यह अवधि अधिक क्षेत्रीय स्वायत्तता और संविधान की छठी अनुसूची के विस्तार की मांगों से चिह्नित थी। विधायी संशोधनों के बाद ओकराम इबोबी सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के तहत 2010 में निर्वाचित स्थानीय शासन बहाल किया गया था। हालाँकि, 2020 में अपने निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद परिषदें फिर से निष्क्रिय हो गईं।
पूर्व पार्षदों का कहना है कि जवाबदेह स्थानीय शासन सुनिश्चित करने, पहाड़ी समुदायों की विकास आवश्यकताओं को पूरा करने और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए निर्वाचित परिषदों को बहाल करना आवश्यक है।