गांधीनगर: महाराष्ट्र फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के कमिश्नर तुकाराम मुंडे ने शनिवार को छात्रों से सोशल मीडिया पर दिखने वाली जानकारी पर सवाल उठाने की अपील की। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर छात्र ऑनलाइन देखी जाने वाली चीज़ों की सच्चाई की जांच करना बंद कर देते हैं, तो रील्स, फ़ॉरवर्ड किए गए मैसेज और एल्गोरिदम उनकी सोच को प्रभावित कर सकते हैं।
कर्णावती यूनिवर्सिटी में छात्रों के साथ लगभग ढाई घंटे की बातचीत के दौरान मुंडे ने कहा कि भारत में सोच बदलने की ज़रूरत है, और इसकी शुरुआत लोगों के खुद से और उन्हें दी जा रही जानकारी पर सवाल उठाने से होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, "हम बहुत सतही हो गए हैं। हम गहराई से नहीं जी रहे हैं, हम सोच नहीं रहे हैं, हम सवाल नहीं पूछ रहे हैं।"
मुंडे ने कहा कि सवाल पूछने का मतलब सिर्फ़ दूसरों को चुनौती देना नहीं है, बल्कि सबसे पहले अपने कामों की जांच करना है। उन्होंने कहा, "आपको सबसे पहले खुद से सवाल पूछना होगा। मैं कौन हूँ? क्या मैं ज़िम्मेदार हूँ या गैर-ज़िम्मेदार? और अगर मैं ऐसा नहीं कर सकता, तो और कौन कर सकता है?"
इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया और "WhatsApp यूनिवर्सिटी" के बढ़ते असर के बारे में बात की। मुंडे ने कहा, "हमारे सामने एक बड़ी चुनौती सोशल मीडिया का असर या WhatsApp यूनिवर्सिटी है।"
उन्होंने कहा कि यूज़र्स अक्सर रील्स और फ़ॉरवर्ड किए गए मैसेज को बिना यह जांचे मान लेते हैं कि जानकारी असली है, तथ्यों पर आधारित है या किसी खास नैरेटिव (सोच) का हिस्सा है।
उन्होंने कहा, "हम उसी आधार पर फ़ैसले लेते हैं, लेकिन हम कभी यह समझने की कोशिश नहीं करते कि जो जानकारी हमें मिली है, वह सच में सही है या नहीं, असली है या नकली, या फिर कोई नैरेटिव है।"
मुंडे ने समझाया कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम यूज़र्स के व्यवहार से सीखते हैं - जैसे कि वे क्या देखते हैं, क्या छोड़ते हैं या किस चीज़ पर प्रतिक्रिया देते हैं - और फिर उन्हें वैसी ही और चीज़ें दिखाते हैं।
उन्होंने कहा, "एक हफ़्ते में आपको वही चीज़ें मिलने लगेंगी जो आपको पसंद हैं। क्योंकि यह आपके दिमाग और आपकी कल्पना पर कब्ज़ा कर लेता है।"
उनके अनुसार, बार-बार एक ही तरह की चीज़ें देखने से ऐसा माहौल बन सकता है जहाँ लोगों को ज़्यादातर ऐसी जानकारी मिलती है जो उनकी पहले से बनी पसंद को और मज़बूत करती है। उन्होंने कहा, "इसका मतलब है कि आपने सोचना बंद कर दिया है। आपको कोई और सिखा रहा है।" मुंधे ने इसे "नए उपनिवेशवाद" का एक रूप बताया, जिसमें एल्गोरिदम और रील्स लोगों के व्यवहार और राय को आकार दे सकते हैं। उन्होंने छात्रों से पूछा: "क्या आप चाहते हैं कि कोई रील आप पर राज करे, या आप खुद एक रील बनाना चाहते हैं?"
उन्होंने छात्रों से कहा कि वे ऑनलाइन कंटेंट के सिर्फ़ पैसिव कंज्यूमर (बिना सोचे-समझे इस्तेमाल करने वाले) बनने के बजाय क्रिएटर बनें। उन्होंने कहा, "जिस पल आप कुछ शुरू करें, तो थोड़ी देर रुकें, ठहरें, एक पल लें और सवाल करें, दूसरे सबूतों के साथ मिलाकर देखें, उसकी जांच करें। तब आपको एहसास होगा कि 'अरे, यहाँ गड़बड़ हो रही है', तो उसे रोक दें या छोड़ दें।"
मुंधे ने इस मुद्दे को नैतिक फ़ैसले लेने के बारे में अपने व्यापक संदेश से जोड़ा।
उन्होंने कहा कि लोगों को जानकारी और फ़ैसलों का आकलन करना चाहिए, न कि बस दूसरों की राह पर चलना चाहिए।
उन्होंने कहा, "सवाल यह है कि क्या फ़ैसला आप खुद ले रहे हैं, या आपके फ़ैसले कोई और ले रहा है?"
उन्होंने कहा कि इस "सोचने के तरीके को रीबूट करने की ज़रूरत है" और इसकी शुरुआत दिमाग से होनी चाहिए।
मुंधे ने कहा, "मेरा मानना है कि यह रीबूट आपके दिमाग में शुरू होना चाहिए, न कि सिर्फ़ रील्स में।" उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के नज़रिए से रोज़मर्रा के फ़ैसलों में मौलिकता, कानूनी समझ और नैतिक सोच लाने में मदद मिलेगी।