पुणे। महाराष्ट्र के पुणे में गणेशोत्सव के पारंपरिक विसर्जन समारोह के दौरान शुक्रवार को शहर के ‘मानाचा पहिला गणपति’ श्री कसबा गणपति की प्रतिमा का विधि-विधान के साथ विसर्जन किया गया। गणपति की प्रतिमा शाम करीब 4:40 बजे नटेश्वर घाट पहुंची, जहां धार्मिक परंपराओं को पूरा करने के बाद प्रतिमा का विसर्जन किया गया। इसके साथ ही कसबा गणपति मंडल का इस वर्ष का विसर्जन समारोह संपन्न हो गया।

पुणे के ग्रामदैवत यानी शहर के मुख्य देवता माने जाने वाले श्री कसबा गणपति का गणेशोत्सव में विशेष स्थान है। पुणे के पांच ‘मानाचे गणपति’ के पारंपरिक विसर्जन जुलूस में कसबा गणपति सबसे आगे रहते हैं। उनके बाद क्रमशः तांबडी जोगेश्वरी गणपति, गुरुजी तालीम गणपति, तुलसीबाग गणपति और केसरीवाड़ा गणपति का स्थान आता है।

शुक्रवार सुबह से ही मध्य पुणे में गणेश विसर्जन को लेकर उत्सव जैसा माहौल दिखाई दिया। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान गणेश को विदाई देने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े। ढोल-ताशों की गूंज और गणपति के जयकारों के बीच पूरे इलाके में भक्तिमय वातावरण बना रहा।

कसबा गणपति के विसर्जन जुलूस की शुरुआत सुबह करीब 9:30 बजे मंडई के पास स्थित लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रतिमा के सामने पारंपरिक पूजा के साथ हुई। पूजा-अर्चना के बाद भगवान गणेश की प्रतिमा को विसर्जन यात्रा के लिए रवाना किया गया। जुलूस के आगे बढ़ते ही रास्ते में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती चली गई।

पारंपरिक वाद्ययंत्रों और ढोल-ताशा पथकों की प्रस्तुतियों ने विसर्जन यात्रा को और भव्य बना दिया। विभिन्न स्थानों पर मौजूद श्रद्धालुओं ने गणपति की प्रतिमा के दर्शन किए और भगवान गणेश को विदाई दी। जुलूस के दौरान श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था।

कसबा गणपति का पुणे के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। गणेशोत्सव के दौरान पांच मानाचे गणपति की पूजा और उनके विसर्जन का क्रम पारंपरिक रूप से निर्धारित है। इसमें कसबा गणपति को पहला सम्मान प्राप्त है और इसी कारण उन्हें ‘मानाचा पहिला गणपति’ कहा जाता है।

कसबा गणपति की विसर्जन यात्रा के बाद अन्य प्रमुख गणपति मंडलों की यात्राएं आगे बढ़ती हैं। तांबडी जोगेश्वरी को दूसरा, गुरुजी तालीम को तीसरा, तुलसीबाग को चौथा और केसरीवाड़ा गणपति को पांचवां स्थान प्राप्त है। इस पारंपरिक क्रम को देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुणे पहुंचते हैं।

शुक्रवार को सुबह शुरू हुई कसबा गणपति की यात्रा मध्य पुणे के निर्धारित मार्गों से होकर आगे बढ़ी। रास्ते भर गणपति बप्पा के जयकारे सुनाई देते रहे। ढोल-ताशा बजाने वाले समूह पारंपरिक धुनों के साथ जुलूस में शामिल हुए। श्रद्धालुओं ने भी उत्साह के साथ भगवान गणेश के दर्शन किए।

जुलूस के दौरान अलग-अलग आयु वर्ग के लोग शामिल नजर आए। कई श्रद्धालु सुबह से ही यात्रा मार्ग पर पहुंच गए थे। जैसे-जैसे प्रतिमा नटेश्वर घाट की ओर बढ़ी, श्रद्धालुओं की भीड़ भी उसके साथ आगे बढ़ती रही।

शाम करीब 4:40 बजे श्री कसबा गणपति की प्रतिमा नटेश्वर घाट पहुंची। यहां मंडल से जुड़े लोगों ने विसर्जन से पहले आवश्यक धार्मिक परंपराएं पूरी कीं। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन किया गया। विसर्जन के दौरान घाट पर मौजूद श्रद्धालुओं ने भगवान गणेश को भावपूर्ण विदाई दी।

कसबा गणपति की प्रतिमा के विसर्जन के साथ मंडल का गणेशोत्सव समारोह पूरा हो गया। कई दिनों तक पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजनों के बाद शुक्रवार को भगवान गणेश को विदाई दी गई।

पुणे का गणेशोत्सव अपनी ऐतिहासिक परंपराओं और भव्य सार्वजनिक आयोजनों के लिए जाना जाता है। विशेष रूप से पांच मानाचे गणपति के विसर्जन जुलूस का अलग महत्व है। इन मंडलों के जुलूस एक निर्धारित क्रम में निकलते हैं और बड़ी संख्या में लोग इन्हें देखने के लिए सड़कों पर मौजूद रहते हैं।

विसर्जन यात्रा के दौरान मध्य पुणे की सड़कों पर धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का संगम दिखाई दिया। एक ओर ढोल-ताशों की गूंज थी तो दूसरी ओर श्रद्धालु भगवान गणेश के जयकारे लगाते हुए दिखाई दिए। कई स्थानों पर लोगों ने जुलूस का स्वागत किया और गणपति के दर्शन किए।

कसबा गणपति के बाद अन्य मानाचे गणपति के जुलूस भी परंपरा के अनुसार आगे बढ़े। पूरे विसर्जन समारोह में पुणे की वर्षों पुरानी गणेशोत्सव परंपरा की झलक देखने को मिली।

शाम को नटेश्वर घाट पर श्री कसबा गणपति की प्रतिमा के विसर्जन के साथ शहर के सबसे प्रमुख गणपति मंडलों में शामिल कसबा गणपति का समारोह संपन्न हुआ। ढोल-ताशों, जयकारों और हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी के बीच भगवान गणेश को अगले वर्ष फिर आने की कामना के साथ विदाई दी गई।

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