Maharashtra महाराष्ट्र: सरकारी आंकड़ों से पता चला है कि कोंकण में मछली उत्पादन में बड़ी गिरावट आई है। पिछले साल की तुलना में मछली उत्पादन में 81,868 मीट्रिक टन की भारी कमी आई है। जलवायु परिवर्तन, राज्य की समुद्री सीमाओं में विदेशी मछली पकड़ने वाली नौकाओं की घुसपैठ, बढ़ता प्रदूषण और अनियंत्रित मछली पकड़ना मछली उत्पादन में गिरावट के कारण हैं। वर्ष 2022-23 में राज्य का मछली उत्पादन 4 लाख 46 हजार 256 मीट्रिक टन था। जो वर्ष 2023-24 में घटकर 3 लाख 64 हजार 288 मीट्रिक टन रह गया। यानी पिछले साल की तुलना में मछली उत्पादन में 81 हजार मीट्रिक टन की कमी आई है। पिछले पांच सालों के मछली उत्पादन के आंकड़ों पर गौर करें तो इस साल सबसे कम मछली उत्पादन हुआ है।

यह चिंता का विषय है। पिछले साल ठाणे और पालघर जिलों में 49 हजार मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ था। मुंबई उपनगरों में 61 हजार मीट्रिक टन, बृहन्मुंबई में सबसे अधिक 1 लाख 38 हजार मीट्रिक टन, रायगढ़ जिले में 28 हजार मीट्रिक टन, रत्नागिरी में 69 हजार और सिंधुदुर्ग जिले में 17 हजार 976 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ। रत्नागिरी जिले को छोड़कर अन्य सभी जिलों में मछली उत्पादन में कमी आई है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले पांच वर्षों में पपलेट, सुरमई, शुंगड़ा, घोल, शेवंड जैसी मछलियों के उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट आई है। यह चिंता का विषय है। पहले तट के पास प्रचुर मात्रा में मछलियाँ होती थीं। अब मछुआरे शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें गहरे समुद्र में जाने के बाद भी मछली नहीं मिल रही है। जलवायु में निरंतर परिवर्तन, कोंकण तट पर चक्रवातों की बढ़ती आवृत्ति, रासायनिक उद्योगों के कारण कोंकण तट पर बढ़ता प्रदूषण और अनियंत्रित मछली पकड़ना, राज्य के समुद्री क्षेत्र में विदेशी नौकाओं द्वारा मछली पकड़ना मछली उत्पादन में गिरावट के मुख्य कारण बताए जाते हैं।
पहले तटीय इलाकों में घोल, करंदी और बागा जैसी मछलियाँ बहुतायत में पाई जाती थीं, लेकिन अब ये मछलियाँ बहुत दुर्लभ हो गई हैं। बॉम्बिल भी उतनी मात्रा में नहीं मिलती जितनी पहले मिलती थी। खाड़ी क्षेत्र में मछलियों की कई प्रजातियाँ अब विलुप्त हो चुकी हैं। प्रवीण टंडेल, मछुआरा
Tags: