Congress ने कभी मांगी थी वीर सावरकर की रिहाई? नया विवाद

Update: 2026-07-02 12:46 GMT
Pune | पुणे : हिंदुत्व विचारक Vinayak Damodar Savarkar को लेकर चल रहे एक मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान बुधवार को अदालत में अहम दावे सामने आए। यह मामला नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi से जुड़े एक पुराने बयान को लेकर दर्ज किया गया है।
सुनवाई के दौरान सावरकर के भाई के प्रपौत्र सात्यकि सावरकर ने अदालत में कहा कि ब्रिटिश सरकार ने विनायक दामोदर सावरकर को उनकी दया याचिकाओं के कारण नहीं, बल्कि बढ़ते जनदबाव के चलते रिहा किया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि 1923 में कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में पारित एक प्रस्ताव भी उनकी रिहाई के लिए महत्वपूर्ण कारणों में से एक था, जिसमें सावरकर की रिहाई की मांग की गई थी।
सात्यकि सावरकर ने आगे कहा कि अगर कांग्रेस ने उसी समय भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी से पहले भी ऐसा प्रस्ताव पारित किया होता, तो संभव है कि उनकी फांसी टल सकती थी। इस बयान के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
अदालत में हुई तीखी जिरह
इस मामले में Rahul Gandhi की ओर से पेश अधिवक्ता मिलिंद पवार ने सात्यकि सावरकर से जिरह की। यह सुनवाई एमपी/एमएलए विशेष अदालत के न्यायाधीश अमोल शिंदे के समक्ष हुई।
जिरह के दौरान ब्रिटिश सरकार को कथित तौर पर सावरकर द्वारा दी गई दया याचिकाओं के कुछ हिस्सों को शिकायतकर्ता के सामने रखा गया। इस दौरान सावरकर की याचिकाओं की भाषा और उनके आशय पर सवाल उठाए गए।
दया याचिका पर बयान
सात्यकि सावरकर ने अदालत में कहा कि उन्हें यह स्पष्ट नहीं है कि दया याचिका की सामग्री सावरकर ने स्वयं लिखी थी या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि वे यह नहीं कह सकते कि सावरकर ने किसी शर्त पर रिहाई की मांग की थी या नहीं।
हालांकि, उन्होंने यह जरूर कहा कि उनके अनुसार सावरकर की रिहाई दया याचिकाओं का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे अन्य कारण भी थे, जिनमें जनदबाव को महत्वपूर्ण बताया गया।
राजनीतिक बहस फिर तेज
इस पूरे घटनाक्रम के बाद एक बार फिर सावरकर की भूमिका और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। मामला अब अदालत की कार्यवाही के साथ-साथ राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है।
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