खाद्य सुरक्षा पर बड़ा सवाल FDA पर क्यों नहीं बन रहा भरोसा
छापेमारी के बाद भी FDA पर भरोसे का संकट
मुंबई: महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा को लेकर फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी FDA इन दिनों लगातार एक्शन में है। रेस्तरां, होटल, डार्क स्टोर, गोदाम और खाद्य प्रतिष्ठानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी हो रही है। लाइसेंस निलंबित किए जा रहे हैं और खराब स्वच्छता तथा नियमों के उल्लंघन पर प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई भी की जा रही है। इसके बावजूद एक बड़ा सवाल सामने है कि इतनी कार्रवाई के बाद भी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर आम लोगों का भरोसा पूरी तरह क्यों नहीं बन पा रहा है?
महाराष्ट्र FDA आयुक्त तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में हाल के महीनों में विभाग ने कार्रवाई की रफ्तार बढ़ाई है। अगस्त में क्विक कॉमर्स कंपनियों से जुड़े गोदामों की जांच के दौरान 86 प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया। इनमें 12 गोदामों के परमिट निलंबित किए गए और 60 को सुधार नोटिस जारी किए गए। कुछ जगह कॉकरोच, चूहों की गंदगी और दूसरी गंभीर स्वच्छता संबंधी कमियां मिलने की बात सामने आई।
कार्रवाई केवल छोटे कारोबारियों तक सीमित नहीं रही। महाराष्ट्र में चार Domino's और एक Pizza Hut आउटलेट पर भी गंभीर स्वच्छता संबंधी उल्लंघनों के बाद कार्रवाई हुई। निरीक्षण में चिकनाई और गंदगी, कीड़ों की मौजूदगी तथा कुछ खाद्य सामग्री पर एक्सपायरी संबंधी जानकारी नहीं होने जैसी खामियां सामने आई थीं। एक दिन में 100 से ज्यादा प्रतिष्ठानों की जांच हुई और 95 को सुधार नोटिस दिए गए। यही आंकड़े लोगों के मन में दूसरा सवाल भी पैदा करते हैं। यदि इतने प्रसिद्ध और संगठित ब्रांडों में निरीक्षण के दौरान गंभीर खामियां मिल सकती हैं तो नियमित निगरानी व्यवस्था पहले इन समस्याओं को क्यों नहीं पकड़ सकी? आम उपभोक्ता के लिए चिंता केवल यह नहीं है कि कार्रवाई हो रही है, बल्कि यह भी है कि खाद्य पदार्थ उसके पास पहुंचने से पहले सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित क्यों नहीं हो पाया।
FDA की विश्वसनीयता को लेकर उठने वाले सवालों के पीछे प्रवर्तन की प्रक्रिया भी एक कारण है। कुछ प्रतिष्ठानों को तत्काल बंद करने के आदेश अदालतों तक पहुंचे हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कुछ मामलों में FDA की ओर से दिए गए तत्काल बंदी आदेशों को पलटा या उन पर सवाल उठाए। इससे बहस शुरू हुई कि खाद्य सुरक्षा के लिए सख्ती जरूरी है, लेकिन कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत और पर्याप्त आधार पर होनी चाहिए।
रेस्तरां उद्योग की संस्था ने भी FDA की जांच का विरोध करने के बजाय कार्रवाई का समर्थन किया, लेकिन साथ ही स्पष्ट संवाद और उचित प्रक्रिया की मांग की। इसका अर्थ यह है कि उद्योग भी खाद्य सुरक्षा मानकों की जांच को जरूरी मानता है, लेकिन चाहता है कि निरीक्षण, नोटिस और बंदी जैसी कार्रवाई में नियम स्पष्ट हों और कारोबारियों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिले।
दूसरी तरफ तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में हो रही कार्रवाई ने FDA को आम जनता के बीच अभूतपूर्व चर्चा में ला दिया है। उनकी छवि सख्त अधिकारी की रही है और मौजूदा अभियान ने उपभोक्ताओं में खाद्य सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाई है। हालिया कार्रवाई को लेकर सार्वजनिक प्रतिक्रिया का एक हिस्सा इसे लंबे समय से जरूरी सख्ती के तौर पर देख रहा है। FDA ने अपने अभियान का दायरा भी लगातार बढ़ाया है। मई में राज्यव्यापी कार्रवाई के दौरान प्रतिबंधित गुटखा और पान मसाला से जुड़े 53 प्रतिष्ठानों की जांच हुई थी। इनमें 34 स्थानों पर उल्लंघन मिला, 25 प्राथमिकी दर्ज हुईं, 33 गिरफ्तारियां की गईं और 27 प्रतिष्ठानों को बंद किया गया। इसी अभियान में खाद्य सुरक्षा कानून के तहत अन्य प्रतिष्ठानों की भी जांच हुई थी।
अब कार्रवाई विज्ञापनों और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट तक पहुंच गई है। FDA ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को पान मसाला से जुड़े कथित सरोगेट विज्ञापन के मामले में नोटिस जारी किए हैं। मुंढे ने कहा है कि नियमों के उल्लंघन के मामले में किसी को भी नहीं छोड़ा जाएगा।
लेकिन किसी नियामक संस्था पर स्थायी भरोसा केवल छापेमारी की संख्या से नहीं बनता। उपभोक्ता को यह पता होना चाहिए कि जांच में क्या मिला, नमूनों की लैब रिपोर्ट क्या रही, किस प्रतिष्ठान पर क्या कार्रवाई हुई और सुधार के बाद उसे दोबारा कारोबार की अनुमति किन आधारों पर मिली। कार्रवाई के बाद नियमित फॉलोअप और परिणामों की सार्वजनिक जानकारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। खाद्य सुरक्षा की वास्तविक सफलता उस स्थिति में होगी जब छापेमारी की जरूरत धीरे-धीरे कम हो और कारोबारियों में नियमों का पालन सामान्य व्यवहार बन जाए। इसके लिए अचानक निरीक्षण के साथ नियमित निगरानी, प्रयोगशाला जांच, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई और उल्लंघन करने वालों पर समान नियम लागू करना जरूरी होगा। महाराष्ट्र FDA की मौजूदा सक्रियता ने खाद्य सुरक्षा को सार्वजनिक बहस के केंद्र में जरूर ला दिया है। लगातार कार्रवाई से यह संदेश भी गया है कि बड़े ब्रांड हों या छोटे प्रतिष्ठान, जांच के दायरे से बाहर कोई नहीं है। हालांकि विभाग की दीर्घकालिक विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह सख्ती कितनी निरंतर, पारदर्शी और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप रहती है। छापेमारी शुरुआत हो सकती है, लेकिन जनता का भरोसा परिणाम और लगातार निगरानी से ही मजबूत होगा।