कोसमी में बेदखली पर शासन को सौंपी रिपोर्ट, प्रशासन के दावों को आदिवासी समाज ने नकारा
सीहोर में आदिवासियों के घर हटाने पर विवाद
भोपाल: मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में आदिवासी परिवारों के घर हटाए जाने के मामले में कलेक्टर की जांच रिपोर्ट शासन को सौंप दी गई है। मुख्यमंत्री मोहन यादव और मुख्य सचिव को भेजी गई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कोसमी क्षेत्र में वन विकास निगम की 31.48 हेक्टेयर भूमि पर अतिक्रमण था। प्रशासन ने कार्रवाई को इसी जमीन से कब्जा हटाने की प्रक्रिया बताया है। वहीं, प्रभावित परिवारों और आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने रिपोर्ट से असहमति जताई है।
रिपोर्ट के अनुसार, विवादित भूमि भैरूंदा तहसील के लाड़कुई परिक्षेत्र की कोसमी बीट में स्थित रिजर्व फॉरेस्ट के कंपार्टमेंट 426 का हिस्सा है। वर्ष 2020 में 186.960 हेक्टेयर वनभूमि सामान्य वनमंडल से वन विकास निगम को हस्तांतरित की गई थी। निगम ने 2021 में 135 हेक्टेयर क्षेत्र में 3,37,500 सागौन के पौधे लगाए थे। प्रशासन का दावा है कि इनमें से 78,700 पौधे नष्ट कर जमीन पर कब्जा किया गया। कलेक्टर की रिपोर्ट में गूगल अर्थ की पुरानी तस्वीरों का उल्लेख है। इसके मुताबिक, 2021 तक संबंधित क्षेत्र खाली था और 2022 में अस्थायी झोपड़ियां तथा खेती के लिए कब्जा दिखाई दिया। रिपोर्ट में 11 अक्टूबर की कार्रवाई के दौरान नौ झोपड़ियां हटाने, कुएं को मिट्टी-मुरम से भरने और प्रक्रिया की ड्रोन वीडियोग्राफी कराने की बात कही गई है।
दूसरी ओर, ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्ष 2004 से क्षेत्र में रह रहे हैं। प्रभावित लोगों ने अपने दावे के समर्थन में 2005 की वन विभाग की दंड पर्चियां दिखाई हैं। एक ग्रामीण ने मार्च 2024 में व्यक्तिगत वनाधिकार के लिए दाखिल दावा पत्र भी प्रस्तुत किया। उनका पक्ष है कि पुराने निवास और वनाधिकार संबंधी दस्तावेजों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
वन विकास निगम के अधिकारियों के अनुसार, कार्रवाई से पहले नोटिस और बेदखली संबंधी आदेश जारी किए गए थे। विभाग का कहना है कि कब्जे के वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं हुए। इसके विपरीत, प्रभावित ग्रामीणों ने कार्रवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। पूर्व सरपंच विक्रम बारेला ने कहा कि परिवारों की फसलें और पानी का स्रोत प्रभावित हुआ। उन्होंने पुराने निवास और वनाधिकार के दावे का भी उल्लेख किया। कुछ लोगों के दूसरे गांव में पक्के मकान होने के प्रशासनिक दावे पर विक्रम बारेला ने अलग स्पष्टीकरण दिया। उनका कहना है कि बड़ा परिवार होने के कारण सिंहपुर में आवास बनाया गया था, जबकि परिवार के कुछ सदस्य कोसमी में रहकर जीवनयापन करते थे। इस तरह मकान और निवास को लेकर भी प्रशासन तथा प्रभावित पक्ष के विवरण अलग हैं।
कार्रवाई के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रभावित परिवारों से मिलने पहुंचे थे। उन्होंने मकान हटाने, फसलों को नुकसान पहुंचाने और कुएं को भरने पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को मामले की जानकारी देकर प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने का भरोसा दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मुख्य सचिव से जांच कराकर रिपोर्ट लेने की बात कही थी। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी मामले का संज्ञान लिया है। आयोग ने मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, वन विभाग के प्रमुख सचिव, सीहोर कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सहित संबंधित अधिकारियों से तीन दिन में जवाब और दस्तावेज मांगे हैं। आयोग के समक्ष कार्रवाई के आधार और प्रभावित परिवारों की स्थिति से संबंधित जानकारी प्रस्तुत की जानी है।
प्रभावित परिवार कार्रवाई के विरोध में धरना दे रहे हैं। फिलहाल शासन को भेजी गई रिपोर्ट प्रशासन का पक्ष प्रस्तुत करती है, जबकि ग्रामीण अपने पुराने निवास और दस्तावेजों के आधार पर उसका विरोध कर रहे हैं। जमीन पर कब्जे की अवधि, परिवारों के दावों और बेदखली की प्रक्रिया को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद बना हुआ है।