वायनाड के चेकाडी में आज भी जिंदा है धान की सदियों पुरानी परंपरा

Update: 2026-08-02 11:46 GMT

केरल : वायनाड जिले में चेकाडी गांव आज भी अपनी पुरानी कृषि परंपराओं को जीवित रखे हुए है। जहां राज्य के कई इलाकों में समय के साथ धान के खेतों की जगह दूसरी फसलों ने ले ली है, वहीं चेकाडी ऐसा गांव है जहां आज भी बड़े पैमाने पर धान की खेती जारी है।

यह वायनाड का एकमात्र ऐसा क्षेत्र माना जाता है जहां धान के खेतों को दूसरी फसलों के लिए बड़े पैमाने पर परिवर्तित नहीं किया गया है। यहां की करीब 300 एकड़ भूमि पर फैले धान के खेत न केवल किसानों की आजीविका का आधार हैं, बल्कि क्षेत्र की सदियों पुरानी कृषि संस्कृति और परंपरा के प्रतीक भी हैं।

देसी धान की किस्मों को आज भी मिल रहा संरक्षण

चेकाडी के खेतों में आज भी पारंपरिक धान की किस्मों की खेती की जाती है। इनमें गंधकशाला जैसी देसी किस्में प्रमुख हैं, जो अपनी गुणवत्ता और स्थानीय पहचान के लिए जानी जाती हैं।

इन पारंपरिक किस्मों को बचाए रखना किसानों के लिए केवल खेती का काम नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने जैसा है। स्थानीय किसान पीढ़ियों से चली आ रही कृषि पद्धतियों को अपनाते हुए इन किस्मों को संरक्षित कर रहे हैं।

किसानों का कहना है कि स्थानीय जलवायु और मिट्टी इन पारंपरिक धान की किस्मों के लिए अनुकूल है, जिससे यहां की खेती की अपनी अलग पहचान बनी हुई है।

प्राकृतिक सुंदरता के बीच बसा है चेकाडी

चेकाडी गांव की भौगोलिक स्थिति भी इसे खास बनाती है। गांव तीन तरफ से जंगलों से घिरा हुआ है, जबकि एक ओर काबानी नदी बहती है। यही प्राकृतिक वातावरण यहां की खेती को विशेष बनाता है।

यह इलाका वायनाड के पुराने गांवों में से एक है, जहां जमीन के बड़े हिस्से पर धान के खेत फैले हुए हैं। यहां खेत और प्रकृति के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है।

बारिश, नदी और जंगलों से मिलने वाला प्राकृतिक संतुलन यहां की कृषि व्यवस्था को मजबूत बनाता है।

मॉनसून में देरी के बावजूद किसानों ने नहीं छोड़ा उत्साह

इस साल मॉनसून के देर से आने के बावजूद चेकाडी के किसानों ने खेती की तैयारियां समय पर शुरू कर दी थीं। किसानों ने खेतों की जुताई, बीज की तैयारी और अन्य शुरुआती काम पहले ही पूरे कर लिए थे।

किसानों का कहना है कि मौसम में बदलाव और कई चुनौतियों के बावजूद खेती को जारी रखना जरूरी है, क्योंकि यह केवल रोजगार का साधन नहीं बल्कि उनकी पहचान भी है।

नई पीढ़ी संभाल रही खेती की जिम्मेदारी

चेकाडी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां की नई पीढ़ी भी धान की खेती से जुड़ी हुई है। आधुनिक समय में जहां कई युवा खेती से दूर हो रहे हैं, वहीं इस गांव के युवा पारंपरिक खेती को आगे बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।

स्थानीय किसानों में चेट्टी और आदिया समुदाय के लोगों की संख्या अधिक है। इन समुदायों ने लंबे समय से इस क्षेत्र की कृषि संस्कृति को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

नई पीढ़ी पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल कर रही है, ताकि खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सके।

खेती छोड़ने की चुनौतियों के बीच कायम है परंपरा

हालांकि, बदलते समय के साथ धान की खेती करने वाले किसानों की संख्या कई क्षेत्रों में कम हो रही है। खेती की बढ़ती लागत, मजदूरों की कमी, मौसम में बदलाव और आर्थिक चुनौतियों के कारण कई किसान दूसरी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं।

लेकिन चेकाडी में अब तक किसी किसान ने पूरी तरह खेती छोड़ने का फैसला नहीं किया है। यहां के लोग मानते हैं कि धान की खेती उनके इतिहास, संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा है।

किसानों का कहना है कि इस परंपरा को बचाने के लिए सरकारी सहायता, बेहतर बाजार व्यवस्था और युवाओं को खेती से जोड़ने के प्रयास जरूरी हैं।

कृषि विरासत का उदाहरण बना चेकाडी

चेकाडी आज केवल एक गांव नहीं, बल्कि पारंपरिक कृषि संरक्षण का उदाहरण बन चुका है। यहां के खेत बताते हैं कि आधुनिक बदलावों के बीच भी पुरानी खेती की पद्धतियों और स्थानीय फसलों को बचाया जा सकता है।

300 एकड़ में फैले धान के खेत इस बात का प्रमाण हैं कि यदि समुदाय अपनी कृषि परंपराओं को महत्व दे तो सदियों पुरानी विरासत को आगे बढ़ाया जा सकता है।

वायनाड के इस गांव में धान की हर फसल के साथ केवल अनाज नहीं उगता, बल्कि एक संस्कृति, एक इतिहास और किसानों की मेहनत की कहानी भी आगे बढ़ती है। चेकाडी के किसान आज भी इस विरासत को अपनी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए जुटे हुए हैं।

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