तिरुवनंतपुरम : 3 नवंबर 2026। संसद की लोक लेखा समिति (PAC) के अध्यक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल ने सरकारी विभागों से समिति की सिफारिशों पर निर्धारित समय के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित करने का आह्वान किया है। उन्होंने सार्वजनिक धन के सही उपयोग, सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत बनाने के लिए प्रभावी विधायी निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया। वेणुगोपाल का कहना है कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि संसदीय समितियों की सिफारिशों को गंभीरता से लिया जाए और उन पर समयबद्ध कार्रवाई की जाए।केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में 3 और 4 नवंबर को आयोजित लोक लेखा समितियों के अध्यक्षों के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान वित्तीय जवाबदेही और सुशासन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा केंद्रित है। इस सम्मेलन का मुख्य विषय 'ऑडिट, जवाबदेही और सुशासन : लोक लेखा समिति की बदलती भूमिका' रखा गया है। कार्यक्रम में संसद और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं की लोक लेखा समितियों के अध्यक्षों तथा सदस्यों की भागीदारी है।
समिति की सिफारिशों पर समयबद्ध कार्रवाई जरूरी
वेणुगोपाल ने इस बात पर जोर दिया कि लोक लेखा समिति की भूमिका केवल सरकारी खर्चों की जांच करने या रिपोर्ट तैयार करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। समिति की सिफारिशों का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब संबंधित मंत्रालय और विभाग उन पर गंभीरता से अमल करेंगे।सरकारी योजनाओं और परियोजनाओं में सार्वजनिक धन का उपयोग निर्धारित नियमों के अनुरूप होना चाहिए। यदि किसी योजना में वित्तीय अनियमितता, देरी या संसाधनों के अनुचित इस्तेमाल की बात सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है।लोक लेखा समिति का उद्देश्य सरकारी विभागों के कामकाज में सुधार लाना और यह सुनिश्चित करना है कि जनता के पैसे का उपयोग उन्हीं उद्देश्यों के लिए किया जाए, जिनके लिए संसद ने बजट को मंजूरी दी है।
विधायी निगरानी से बढ़ती है प्रशासनिक जवाबदेही
लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद और विधानसभाओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकार के कार्यों की समीक्षा करना है। इस व्यवस्था में लोक लेखा समिति एक प्रभावी माध्यम के रूप में कार्य करती है।समिति नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों की जांच करती है और सरकारी खर्चों से संबंधित मामलों में संबंधित विभागों से स्पष्टीकरण मांगती है। इसके आधार पर सुधारात्मक कदम उठाने के लिए सिफारिशें प्रस्तुत की जाती हैं।विधायी निगरानी का उद्देश्य केवल गलतियों को उजागर करना नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी कमियों को रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था विकसित करना भी है।विशेषज्ञों के अनुसार, यदि संसदीय समितियों की सिफारिशों पर समय रहते कार्रवाई की जाए, तो सरकारी योजनाओं की कार्यक्षमता बेहतर हो सकती है। इससे प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता बढ़ने और सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने में मदद मिल सकती है।
राष्ट्रीय सम्मेलन में वित्तीय अनुशासन पर मंथन
तिरुवनंतपुरम में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में सार्वजनिक व्यय की निगरानी, लेखा परीक्षण प्रणाली और वित्तीय अनुशासन को मजबूत करने के उपायों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इस सम्मेलन का उद्घाटन करने वाले प्रमुख अतिथियों में शामिल हैं। कार्यक्रम में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन और विभिन्न राज्यों की विधायी समितियों के प्रतिनिधियों की भागीदारी निर्धारित की गई है।सम्मेलन का उद्देश्य अलग-अलग राज्यों में अपनाई जा रही प्रभावी कार्यप्रणालियों और अनुभवों को साझा करना है, ताकि लोक लेखा समितियां सरकारी खर्चों की निगरानी में और प्रभावी भूमिका निभा सकें।
सरकारी खर्चों की जांच में PAC की अहम भूमिका
लोक लेखा समिति संसद की प्रमुख वित्तीय समितियों में से एक है। इसका मुख्य कार्य यह देखना है कि सरकार द्वारा खर्च की गई धनराशि संसद की स्वीकृति और निर्धारित वित्तीय नियमों के अनुरूप है या नहीं।समिति सरकारी विभागों, मंत्रालयों और सार्वजनिक संस्थानों से संबंधित वित्तीय मामलों की समीक्षा करती है। इसके अतिरिक्त लेखा परीक्षण में सामने आई अनियमितताओं और प्रशासनिक कमियों पर संबंधित अधिकारियों से जानकारी भी मांग सकती है।समिति की रिपोर्टों में सरकारी कार्यप्रणाली में सुधार के सुझाव दिए जाते हैं। हालांकि, इन सिफारिशों को प्रभावी बनाने के लिए संबंधित विभागों की सक्रिय भूमिका आवश्यक होती है।कई मामलों में सिफारिशों के अनुपालन में देरी होने से सुधारात्मक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि समयबद्ध कार्रवाई और नियमित समीक्षा को महत्वपूर्ण माना जाता है।
पारदर्शिता और सुशासन को मिलेगी मजबूती
वित्तीय जवाबदेही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में बड़ी धनराशि खर्च करती है।ऐसे में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सरकारी बजट का लाभ सही लोगों तक पहुंचे और योजनाओं का क्रियान्वयन निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप हो।लोक लेखा समिति की सक्रिय निगरानी से सरकारी विभागों को अपने निर्णयों और खर्चों के संबंध में जवाब देना पड़ता है। इससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली में सुधार की संभावनाएं बढ़ती हैं।
संसदीय समितियों की भूमिका और प्रभावी बनाने पर जोर
राष्ट्रीय सम्मेलन में लोक लेखा समितियों के सामने मौजूद नई चुनौतियों पर भी चर्चा की जा रही है। इनमें बदलती वित्तीय प्रणालियां, आधुनिक लेखा परीक्षण तकनीक, सरकारी परियोजनाओं की बढ़ती जटिलता और समयबद्ध अनुपालन जैसे मुद्दे शामिल हैं।डिजिटल प्रशासन के विस्तार के साथ सरकारी खर्चों की निगरानी के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया है। ऐसे में वित्तीय समितियों की कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।सम्मेलन के माध्यम से केंद्र और राज्यों की समितियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा अनुभवों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की उम्मीद है।वेणुगोपाल द्वारा उठाया गया समयबद्ध कार्रवाई का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि समिति की सिफारिशों का उद्देश्य केवल रिपोर्ट तैयार करना नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था में व्यावहारिक सुधार सुनिश्चित करना है।सरकारी विभाग यदि इन सुझावों को गंभीरता से लागू करते हैं, तो सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन को मजबूती मिल सकती है। यही प्रभावी लोकतांत्रिक निगरानी और बेहतर प्रशासन की बुनियाद है।