केरल के थोडुपुझा की सेवानिवृत्त सहायक शिक्षिका सौदा बीवी बताती हैं, "मैंने अपने स्कूल में कई बार इनविजिलेटर (परीक्षा निरीक्षक) के तौर पर काम किया है। हमारा स्कूल PSC परीक्षा केंद्र भी था, जहाँ उच्च और निम्न श्रेणी के सरकारी पदों के लिए परीक्षाएं आयोजित की जाती थीं। सच कहूँ तो, इन परीक्षाओं से पहले की रातों में हम तनाव और जिम्मेदारी के कारण सो नहीं पाते थे। इन परीक्षाओं को बहुत सावधानी और सतर्कता के साथ आयोजित करना होता था। अब यह सुनकर बहुत दुख और निराशा होती है कि हमारी वे सारी कोशिशें शायद बेकार और व्यर्थ थीं।"

प्रकाश कार्तिकेयन की कहानी और भी ज्यादा परेशान करने वाली है। 37 साल की उम्र में भी बेरोजगार, प्रकाश ने अपने तीसरे प्रयास में सामान्य श्रेणी (जनरल कैटेगरी) के तहत LD क्लर्क पद के लिए PSC रैंक लिस्ट में जगह बनाई थी। फिर भी, वह अभी भी नियुक्ति कॉल का इंतजार कर रहे हैं, जबकि रैंक लिस्ट की समय-सीमा खत्म होने के करीब है। सामने आए घोटाले ने आयोग के भीतर की चिंताजनक स्थिति को उजागर कर दिया है, जिससे प्रकाश की बची-खुची उम्मीद भी अब खत्म होती जा रही है।

केरल में PSC के भीतर गहरे भ्रष्टाचार के चौंकाने वाले खुलासों के बाद, प्रकाश और सौदा जैसे सैकड़ों लोग अब पछता रहे हैं कि उन्होंने आयोग की परीक्षा और मूल्यांकन प्रक्रिया पर भरोसा किया और उसमें हिस्सा लिया। पूर्व वायु सेना अधिकारी मोहनदास का मानना ​​है कि अब समय आ गया है कि सरकारी भर्ती प्रक्रिया में इंसानी दखल को कम किया जाए और इसकी जगह तकनीक पर आधारित, सुरक्षित और कुशल मॉडल अपनाए जाएं। वहीं, वडोदरा के एक सेवानिवृत्त LIC अधिकारी का तर्क है कि सिस्टम को साफ करने का एकमात्र तरीका इन संस्थानों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना है। 'द न्यू इंडियन एक्सप्रेस' ने कई आम नागरिकों से बात की, जो इस खराब हो चुके सरकारी तंत्र का खामियाजा भुगत रहे हैं। उन्हीं में से कुछ लोगों ने ये विचार रखे।

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