तिरुवनंतपुरम: राज्य सरकार ने कन्नूर में औद्योगिक विकास के लिए KIIFB द्वारा अधिग्रहित की गई जमीन की विजिलेंस जांच के आदेश दिए हैं। इस जमीन पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि यह पूरी तरह से खदान के गड्ढों से भरी हुई है। कैबिनेट ने विजिलेंस विभाग को इस मामले की जांच सौंपने का फैसला किया है, जिसमें वित्त और राजस्व विभाग भी मदद करेंगे। जांच का मुख्य फोकस इस बात पर होगा कि जमीन अधिग्रहण की मंजूरी देने में क्या कमियां या अनियमितताएं रहीं। 'केरल कौमुदी' ने पहले ही इस अधिग्रहण प्रक्रिया में अनियमितताओं की
रिपोर्ट दी थी
।
KIIFB ने कन्नूर में 2,074 एकड़ पहाड़ी जमीन, बिना किसी मंजूरी के 2.49 करोड़ रुपये प्रति एकड़ की दर से खरीदी। यह कीमत बाजार मूल्य से पांच गुना अधिक थी। पहले 1,000 एकड़ जमीन लेने की योजना थी, जिसे बाद में बदल दिया गया और अधिकारियों ने कन्नूर में चार चरणों में कुल 4,896 एकड़ जमीन लेने का फैसला किया। पिछले छह वर्षों में, 1,000 करोड़ रुपये में खरीदी गई इस जमीन पर कोई काम नहीं हुआ है। हाई कोर्ट द्वारा गठित एक तकनीकी समिति ने पाया था कि इस जमीन पर निर्माण कार्य संभव ही नहीं है।
नियमों के अनुसार, बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण के प्रशासनिक खर्च, जमीन की कुल कीमत के 2.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होने चाहिए। लेकिन, KIIFB ने इस अधिग्रहण के लिए 1,900 करोड़ रुपये से अधिक का प्रशासनिक खर्च दिखाया है। रेलवे परियोजनाओं जैसी जटिल अधिग्रहण प्रक्रियाओं में प्रशासनिक खर्च की सीमा पांच प्रतिशत है, जबकि केंद्र सरकार की अन्य परियोजनाओं के लिए यह सीमा एक प्रतिशत है। विजिलेंस विभाग इस पहलू की भी जांच करेगा। बजट घोषणा में बदलाव
2016-17 के बजट में कन्नूर के पट्टन्नूर स्थित पनायथपरम्बा में 1,000 एकड़ जमीन लेने की घोषणा की गई थी। बाद में इसे बदल दिया गया और कन्नूर में 4,896 एकड़ जमीन लेने का निर्णय लिया गया।
KIIFB के CEO के एक पत्र के आधार पर, कन्नूर और पलक्कड़ जिलों में 12,727 करोड़ रुपये की जमीन के अधिग्रहण के लिए प्रशासनिक मंजूरी दी गई थी।
कैबिनेट के फैसले और बजट घोषणा के बिना KIIFB जमीन का अधिग्रहण नहीं कर सकता। अगर अभी ज़मीन बेच भी दी जाए, तो भी सरकार निवेश की गई रकम का पांचवां हिस्सा भी वसूल नहीं कर पाएगी। लोन की अदायगी और ब्याज एक बहुत बड़ा वित्तीय बोझ बन गए हैं।
Tags: