छात्रों को बकरियां और अभिभावकों को रोजगार प्रशिक्षण दे रहा सरकारी स्कूल
पथानामथिट्टा। केरल के पथानामथिट्टा जिले के एक दूरदराज गांव में स्थित सरकारी स्कूल शिक्षा को परिवारों की आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ने की अनूठी पहल कर रहा है। रानी के पास किसिमम में मौजूद सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ आय का स्रोत विकसित करने के लिए बकरियां उपलब्ध करा रहा है। वहीं उनके माता-पिता को मुर्गी पालन, एलईडी बल्ब निर्माण और दूसरे स्वरोजगार से जुड़े कामों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
स्कूल ने यह पहल वर्ष 2023 में शुरू की थी। इसका उद्देश्य केवल विद्यार्थियों की शैक्षणिक जरूरतें पूरी करना नहीं, बल्कि आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे उनके परिवारों को भी मजबूत बनाना है। स्कूल प्रबंधन का मानना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति का बच्चों की पढ़ाई पर सीधा प्रभाव पड़ता है। आय की कमी होने पर कई परिवारों को बच्चों की शिक्षा जारी रखने में परेशानी होती है। इसी समस्या का व्यावहारिक समाधान निकालने के लिए स्कूल ने शिक्षा और रोजगार को जोड़ने वाला मॉडल अपनाया।
योजना के तहत चयनित विद्यार्थियों को बकरियां दी जा रही हैं। छात्र अपने परिवार की सहायता से उनकी देखभाल करते हैं। बकरी पालन से परिवार को भविष्य में आय प्राप्त करने का अवसर मिलता है। बकरियों की संख्या बढ़ने पर परिवार उन्हें बेचकर पैसा कमा सकता है। इससे पशुपालन का छोटा व्यवसाय शुरू करने की संभावना भी बनती है।
विद्यार्थियों को बकरियां देने का उद्देश्य उनमें जिम्मेदारी और व्यावहारिक ज्ञान विकसित करना भी है। बच्चे पशुओं को चारा देने, उनकी साफ-सफाई करने और स्वास्थ्य का ध्यान रखने जैसी गतिविधियों से जुड़ते हैं। इससे उन्हें पशुपालन की प्रारंभिक जानकारी मिलती है। स्कूल की कोशिश है कि विद्यार्थी पुस्तकीय ज्ञान के साथ जीवन उपयोगी कौशल भी सीखें।
यह पहल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रखी गई है। स्कूल उनके माता-पिता को भी विभिन्न स्वरोजगार गतिविधियों के लिए प्रशिक्षित कर रहा है। अभिभावकों को मुर्गी पालन की जानकारी दी जाती है, ताकि वे सीमित संसाधनों के साथ अपने घर के पास आय का साधन तैयार कर सकें। उन्हें पक्षियों की देखभाल, चारा प्रबंधन, स्वास्थ्य सुरक्षा और उत्पादों की बिक्री जैसे विषयों से परिचित कराया जाता है।
इसके अलावा अभिभावकों को एलईडी बल्ब तैयार करने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। इस काम को अपेक्षाकृत कम जगह और सीमित निवेश के साथ शुरू किया जा सकता है। प्रशिक्षण के माध्यम से प्रतिभागियों को बल्ब के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने, तकनीकी खराबी पहचानने और तैयार उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने की प्रारंभिक जानकारी दी जाती है। इससे ग्रामीण परिवारों के सामने पारंपरिक आजीविका से अलग विकल्प उपलब्ध हो रहे हैं।
स्कूल की इस पहल के पीछे एक महत्वपूर्ण विचार यह है कि बच्चे का विकास परिवार और समुदाय से अलग नहीं हो सकता। यदि माता-पिता के पास नियमित आय का साधन होगा तो वे बच्चों की पढ़ाई, किताबों, परिवहन और अन्य जरूरतों पर अधिक ध्यान दे सकेंगे। आर्थिक दबाव कम होने से विद्यार्थियों के बीच पढ़ाई छोड़ने की आशंका भी घट सकती है।
दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के लिए नियमित रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं। कई परिवार दिहाड़ी मजदूरी, छोटे कृषि कार्यों या मौसमी रोजगार पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में मुर्गी पालन, बकरी पालन और एलईडी बल्ब निर्माण जैसी गतिविधियां उनके लिए अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकती हैं। इन्हें परिवार के सदस्य अपने घर या गांव में रहकर भी संचालित कर सकते हैं।
सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल ने इस पहल के माध्यम से अपनी भूमिका को कक्षा और परीक्षा तक सीमित नहीं रखा है। स्कूल समुदाय के साथ मिलकर परिवारों की सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं का समाधान तलाश रहा है। शिक्षक विद्यार्थियों की शैक्षणिक स्थिति के साथ उनकी पारिवारिक परिस्थितियों को भी समझने का प्रयास करते हैं। इसी के आधार पर जरूरतमंद बच्चों और अभिभावकों को कार्यक्रम से जोड़ा जाता है।
इस प्रकार की योजनाओं की सफलता के लिए लगातार मार्गदर्शन और निगरानी आवश्यक होती है। लाभार्थी परिवारों को केवल बकरियां या प्रशिक्षण देकर छोड़ने के बजाय समय-समय पर उनकी प्रगति की जानकारी लेना जरूरी है। पशुओं के स्वास्थ्य की जांच, टीकाकरण, चारे की व्यवस्था और बीमारी से बचाव में विशेषज्ञों का सहयोग भी उपयोगी हो सकता है।
इसी तरह एलईडी बल्ब निर्माण का प्रशिक्षण लेने वाले लोगों को कच्चा माल उपलब्ध कराने और तैयार उत्पाद बेचने के लिए बाजार से जोड़ना जरूरी होगा। यदि प्रशिक्षण के बाद बिक्री का माध्यम नहीं मिलता तो प्रतिभागियों के लिए काम जारी रखना मुश्किल हो सकता है। स्थानीय निकाय, स्वयं सहायता समूह और सहकारी संस्थाएं इस दिशा में स्कूल की मदद कर सकती हैं।
मुर्गी पालन से जुड़े परिवारों को भी पक्षियों में फैलने वाली बीमारियों, बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव और चारे की लागत जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए स्वरोजगार प्रशिक्षण में आर्थिक योजना, जोखिम प्रबंधन और बाजार की समझ को शामिल करना आवश्यक है। इससे परिवार अपने छोटे व्यवसाय को लंबे समय तक संचालित कर सकेंगे।
स्कूल की पहल बच्चों में श्रम के प्रति सम्मान और उद्यमिता की भावना विकसित करने में भी मदद कर सकती है। विद्यार्थी यह समझ सकते हैं कि शिक्षा का संबंध केवल नौकरी पाने से नहीं, बल्कि नए अवसर तैयार करने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने से भी है। पशुपालन और स्थानीय व्यवसायों का अनुभव उन्हें भविष्य में अपनी रुचि के अनुसार निर्णय लेने में सहायता कर सकता है।
इस मॉडल से स्कूल और अभिभावकों के बीच संवाद भी मजबूत हो रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रमों के कारण माता-पिता नियमित रूप से स्कूल से जुड़ते हैं। शिक्षक उन्हें बच्चों की पढ़ाई, उपस्थिति और अन्य जरूरतों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। इससे शिक्षा को लेकर परिवारों की भागीदारी बढ़ने की संभावना रहती है।
किसिमम के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल की पहल यह संदेश देती है कि शैक्षणिक संस्थान स्थानीय जरूरतों को समझकर सामाजिक बदलाव के केंद्र बन सकते हैं। विद्यार्थियों को बकरियां देने और माता-पिता को स्वरोजगार का प्रशिक्षण देने वाला यह प्रयोग शिक्षा, कौशल विकास और आजीविका को एक साथ जोड़ता है।
यदि योजना से जुड़े परिवार स्थायी आय अर्जित करने लगते हैं तो इसे दूसरे ग्रामीण स्कूलों के लिए भी उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि इसके व्यापक विस्तार से पहले परिणामों, लागत और लाभार्थियों की प्रगति का आकलन किया जाना आवश्यक होगा। फिलहाल यह सरकारी स्कूल बच्चों को पढ़ाने के साथ उनके पूरे परिवार को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहा है।