विलांगड-कुन्होम वन मार्ग को वैकल्पिक रास्ते के रूप में फिर खोलने की मांग तेज
केरल : वायनाड और कोझिकोड को जोड़ने वाला ऐतिहासिक विलांगड-कुन्होम वन मार्ग एक बार फिर चर्चा में है। क्षेत्र के लोगों के बीच इस पुराने रास्ते को बिना लंबा चक्कर लगाए दोनों जिलों के बीच आवागमन के लिए वैकल्पिक मार्ग के तौर पर विकसित करने की मांग उठ रही है। दशकों से वन विभाग की सख्त पाबंदियों के कारण बंद पड़े इस मार्ग का महत्व केवल यातायात तक सीमित नहीं है। यह रास्ता उत्तरी मालाबार के इतिहास, पझासी राजा के ब्रिटिश विरोधी संघर्ष और आदिवासी समुदायों की बहादुरी की अनेक स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए है।
विलांगड-कुन्होम मार्ग कभी उत्तरी मालाबार और वायनाड के बीच संपर्क का महत्वपूर्ण जरिया हुआ करता था। आज भले ही आधुनिक सड़कों और परिवहन सुविधाओं ने इस पुराने मार्ग का महत्व कम कर दिया हो, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए इसकी ऐतिहासिक और भौगोलिक उपयोगिता अब भी बनी हुई है। क्षेत्रवासियों का मानना है कि यदि पर्यावरणीय और वन संरक्षण से जुड़े नियमों का पालन करते हुए इस मार्ग को नियंत्रित तरीके से आवागमन के लिए उपलब्ध कराया जाए, तो कोझिकोड और वायनाड के बीच यात्रा करने वालों को लंबा चक्कर लगाने से राहत मिल सकती है।
इस मार्ग का संबंध केरल वर्मा पझासी राजा के अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष से भी रहा है। इतिहास के अनुसार ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ाई के दौरान पझासी राजा और उनके सैनिक उत्तरी मालाबार से वायनाड के घने जंगलों की ओर जाने के लिए इसी क्षेत्र के रास्तों का इस्तेमाल करते थे। उस दौर में जंगलों के बीच मौजूद ये मार्ग सैन्य गतिविधियों और स्थानीय समुदायों के आवागमन के लिए महत्वपूर्ण थे। पझासी राजा ने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष किया और स्थानीय लोगों तथा आदिवासी समुदायों का भी उन्हें समर्थन मिला।
विलांगड-कुन्होम वन मार्ग पर स्थित ‘ओट्टुपारा’ भी पझासी राजा के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। बताया जाता है कि इसी क्षेत्र में पझासी राजा को पकड़ा गया था। यही वजह है कि यह रास्ता केवल भौगोलिक संपर्क का साधन नहीं, बल्कि केरल के औपनिवेशिक इतिहास और प्रतिरोध की गाथा का हिस्सा भी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करते हुए मार्ग के बारे में नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए।
थामारासेरी और कुट्टियाडी सड़कों के निर्माण से पहले कोझिकोड और नादापुरम क्षेत्र के लोगों के लिए वायनाड पहुंचने का यह रास्ता बेहद महत्वपूर्ण था। उस समय आधुनिक परिवहन व्यवस्था विकसित नहीं हुई थी और लोग आवश्यक वस्तुओं के लिए लंबी दूरी पैदल तय करते थे। पेयजल और व्यापार जैसी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी लोग जंगलों से होकर वायनाड की ओर जाते थे। स्थानीय व्यापारियों और ग्रामीणों के लिए यह मार्ग क्षेत्रीय संपर्क का अहम माध्यम था।
समय के साथ थामारासेरी और कुट्टियाडी जैसे प्रमुख मार्ग विकसित हुए और लोगों का आवागमन इन सड़कों की ओर स्थानांतरित हो गया। इसके बाद विलांगड-कुन्होम वन मार्ग का इस्तेमाल धीरे-धीरे कम होता गया। वन क्षेत्र में संरक्षण संबंधी नियमों और विभागीय प्रतिबंधों के कारण आम लोगों की आवाजाही पर भी रोक लग गई। परिणामस्वरूप ऐतिहासिक महत्व वाला यह रास्ता लंबे समय से बंद पड़ा है।
स्थानीय लोगों का तर्क है कि वर्तमान समय में कोझिकोड और वायनाड के बीच आवागमन के लिए उपलब्ध प्रमुख मार्गों पर यातायात का दबाव बढ़ रहा है। कई स्थानों पर दूरी अधिक होने के कारण लोगों को अतिरिक्त समय और ईंधन खर्च करना पड़ता है। ऐसे में यदि विलांगड-कुन्होम मार्ग को वैकल्पिक संपर्क मार्ग के रूप में विकसित करने की संभावनाओं का अध्ययन किया जाए तो क्षेत्रीय आवागमन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि वन क्षेत्र से जुड़े इस मार्ग को खोलने में पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण सबसे बड़ी चुनौती है। जंगल के भीतर सड़क निर्माण या यातायात बढ़ाने से वन्यजीवों के आवास और प्राकृतिक पारिस्थितिकी पर असर पड़ने की आशंका रहती है। इसलिए स्थानीय स्तर पर उठ रही मांग के बावजूद किसी भी निर्णय से पहले पर्यावरणीय प्रभाव, वन्यजीव संरक्षण और वन विभाग के नियमों को ध्यान में रखना जरूरी होगा।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि मार्ग खोलने का मतलब अनियंत्रित निर्माण या भारी यातायात को बढ़ावा देना नहीं होना चाहिए। इसके बजाय सीमित और नियंत्रित आवागमन, पर्यावरणीय मानकों के पालन तथा ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण के साथ इस रास्ते के उपयोग की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है। इससे एक ओर लोगों को वैकल्पिक संपर्क मिल सकता है, वहीं दूसरी ओर पझासी राजा और आदिवासी संघर्षों से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों को भी पहचान मिल सकती है।
विलांगड-कुन्होम मार्ग को लेकर उठ रही चर्चा ने इतिहास, विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल भी सामने ला दिया है। स्थानीय लोगों के लिए यह पुराना रास्ता उनकी सामाजिक और ऐतिहासिक स्मृतियों का हिस्सा है, जबकि वन विभाग के लिए जंगल और जैव विविधता का संरक्षण प्राथमिक जिम्मेदारी है। ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग और प्रशासन इस ऐतिहासिक मार्ग की उपयोगिता और संरक्षण, दोनों पहलुओं को ध्यान में रखते हुए क्या रास्ता निकालते हैं।
फिलहाल विलांगड-कुन्होम वन मार्ग एक बार फिर स्थानीय चर्चा के केंद्र में है। पझासी राजा के संघर्षों की यादों से जुड़े इस पुराने रास्ते को लेकर लोगों की उम्मीद है कि भविष्य में इसे लेकर कोई व्यावहारिक और पर्यावरण-अनुकूल समाधान सामने आएगा। यदि ऐसा संभव हुआ तो यह मार्ग न केवल वायनाड और कोझिकोड के बीच संपर्क का वैकल्पिक साधन बन सकता है, बल्कि क्षेत्र के इतिहास और विरासत को नई पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।