CJI सूर्यकांत ने उठाए बड़े सवाल, न्यायिक व्यवस्था में सुधार पर दिया जोर
कोच्चि। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने रविवार को केरल उच्च न्यायालय के प्लेटिनम जुबली समारोह में न्यायिक प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को इस बात पर गंभीरता से आत्ममंथन करना चाहिए कि मामलों की तत्काल सुनवाई और समय पर न्याय उपलब्ध कराने की व्यवस्था को किस तरह बेहतर बनाया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने विशेष रूप से उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करने वाले याचिकाकर्ताओं की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की।केरल उच्च न्यायालय के 70 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट हमेशा उच्च न्यायालयों की संस्थागत स्वायत्तता का सम्मान करता रहा है। उच्च न्यायालयों को अपने मामलों की सुनवाई का क्रम और रोस्टर तय करने का अधिकार है। हालांकि, तत्काल सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचने वाले लोगों की बढ़ती संख्या इस बात पर विचार करने का अवसर देती है कि न्यायिक प्रक्रियाओं की जवाबदेही और तत्परता में सुधार की कितनी गुंजाइश है।
तत्काल सुनवाई की व्यवस्था पर उठाए सवाल
मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन में कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या अत्यावश्यक मामलों की पहचान अधिक प्रभावी तरीके से की जा सकती है? क्या मामलों को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और पूर्वानुमान योग्य बनाया जा सकता है? क्या तकनीक की मदद से ऐसे मामलों को प्राथमिकता दी जा सकती है, जिनमें देरी होने से किसी व्यक्ति को अपूरणीय नुकसान पहुंच सकता है?उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या ऐसी न्यायिक व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है, जिसमें समय पर न्याय पाने के लिए किसी नागरिक को देश की राजधानी दिल्ली तक यात्रा करने की आवश्यकता न पड़े।सीजेआई के इन सवालों को न्यायिक प्रशासन में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। उनका जोर इस बात पर था कि न्यायिक प्रक्रिया केवल कानूनी औपचारिकताओं तक सीमित न रहे, बल्कि आम नागरिकों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप काम करे।
न्याय केवल दिल्ली तक सीमित नहीं
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि भारत में संवैधानिक न्याय की शुरुआत और समाप्ति केवल नई दिल्ली में नहीं होती। देश की न्यायिक व्यवस्था की वास्तविक ताकत विभिन्न राज्यों में कार्यरत 25 उच्च न्यायालयों के मजबूत नेटवर्क में निहित है।उन्होंने कहा कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने और कानून के शासन को बनाए रखने की संवैधानिक जिम्मेदारी सौंपी गई है।मुख्य न्यायाधीश के अनुसार, उच्च न्यायालय आम लोगों की दैनिक समस्याओं और स्थानीय परिस्थितियों से अधिक निकटता से जुड़े होते हैं। वे क्षेत्रीय समुदायों की आवश्यकताओं, स्थानीय विवादों और सरकारी निर्णयों के व्यावहारिक प्रभावों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।इसलिए न्यायिक व्यवस्था में उच्च न्यायालयों की भूमिका केवल अपीलों की सुनवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उनका प्रमुख दायित्व है।
समय पर अंतरिम राहत देना बेहद जरूरी
सीजेआई सूर्यकांत ने संविधान के अनुच्छेद 226 का उल्लेख करते हुए कहा कि उच्च न्यायालयों के पास विभिन्न कानूनी, प्रशासनिक, वैधानिक और संविदात्मक विवादों में प्रभावी राहत प्रदान करने की व्यापक शक्तियां हैं।उन्होंने विशेष रूप से समय पर अंतरिम राहत देने के महत्व को रेखांकित किया। उनका कहना था कि कई मामलों में न्याय और अन्याय के बीच अंतर केवल अंतिम फैसले से निर्धारित नहीं होता, बल्कि इस बात से भी तय होता है कि अदालत ने आवश्यक समय पर हस्तक्षेप किया या नहीं।यदि किसी व्यक्ति के अधिकारों को तत्काल खतरा हो और न्यायिक हस्तक्षेप में देरी हो जाए, तो बाद में मिलने वाली राहत का व्यावहारिक महत्व कम हो सकता है।उनका यह संदेश उन मामलों के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिनमें नागरिक स्वतंत्रता, आजीविका, संपत्ति और अन्य मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं।
केरल हाई कोर्ट के 70 वर्षों के योगदान की सराहना
समारोह में मुख्य न्यायाधीश ने केरल उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक योगदान की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि वर्ष 1956 में केरल राज्य और केरल उच्च न्यायालय, दोनों की स्थापना हुई थी। पिछले सात दशकों में राज्य और उच्च न्यायालय की विकास यात्रा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी रही है।उन्होंने बताया कि केरल उच्च न्यायालय की न्यायिक विरासत वर्ष 1956 से भी पुरानी है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें त्रावणकोर और कोचीन की न्यायिक व्यवस्थाओं से जुड़ी हैं।वर्ष 1887 में त्रावणकोर उच्च न्यायालय की स्थापना हुई थी। इसके बाद वर्ष 1949 में त्रावणकोर-कोचीन उच्च न्यायालय अस्तित्व में आया। इन संस्थाओं ने वर्तमान केरल उच्च न्यायालय की मजबूत नींव तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।सीजेआई ने कहा कि केरल उच्च न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों के माध्यम से संवैधानिक सिद्धांतों को नागरिकों के वास्तविक जीवन से जोड़ने का काम किया है।
सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान रोकने के फैसले का जिक्र
मुख्य न्यायाधीश ने केरल उच्च न्यायालय के वर्ष 1999 के उस ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया गया था।उन्होंने इस फैसले को संवैधानिक दूरदर्शिता का उदाहरण बताया। सीजेआई ने कहा कि उच्च न्यायालय ने समाज में व्यापक बदलाव की प्रतीक्षा करने के बजाय कानून के माध्यम से समाज को नई दिशा दिखाई।उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित मामलों में भी केरल उच्च न्यायालय के योगदान की सराहना की।
न्यायपालिका में तकनीक और पारदर्शिता पर जोर
मुख्य न्यायाधीश के संबोधन का एक प्रमुख पहलू न्यायिक प्रक्रियाओं में आधुनिक तकनीक के उपयोग की संभावनाएं थीं।उन्होंने संकेत दिया कि तकनीकी साधनों की सहायता से अत्यावश्यक मामलों की पहचान और उनकी सुनवाई को प्राथमिकता देने की व्यवस्था अधिक प्रभावी बनाई जा सकती है।हालांकि, उन्होंने किसी विशेष नई तकनीकी प्रणाली या तत्काल लागू किए जाने वाले सुधार की घोषणा नहीं की। उनका संबोधन न्यायिक संस्थाओं को मौजूदा प्रक्रियाओं की समीक्षा करने और आवश्यक सुधारों पर विचार करने का आह्वान था।
न्यायिक संस्थाओं के बीच तालमेल जरूरी
सीजेआई सूर्यकांत ने केरल के बैकवाटर्स का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार अनेक जलधाराएं मिलकर एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखती हैं, उसी प्रकार देश की संवैधानिक अदालतों को भी अपनी स्वतंत्र पहचान और अधिकार बनाए रखते हुए साझा उद्देश्य के लिए मिलकर काम करना चाहिए।उन्होंने कहा कि शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और जनभागीदारी ने केरल के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। न्यायिक संस्थाओं को भी संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और नागरिकों तक न्याय पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए।केरल उच्च न्यायालय के प्लेटिनम जुबली समारोह में दिया गया उनका संबोधन न्यायिक व्यवस्था को अधिक नागरिक-केंद्रित बनाने की आवश्यकता पर केंद्रित रहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की सफलता केवल फैसलों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ी है कि जरूरतमंद नागरिकों को सही समय पर प्रभावी न्याय मिल सके।