कोच्चि: 25 अक्टूबर को चेरानल्लूर में हुए हादसे की जांच को लेकर पुलिस और अभियोजन पक्ष पर कड़ी टिप्पणी करते हुए, एर्नाकुलम की अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने गुरुवार को उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें नाबालिग ड्राइवर को मिली जमानत रद्द करने की मांग की गई थी।

महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली इस अदालत ने, कानून के दायरे में आने वाले नाबालिग के खिलाफ दर्ज FIR के आधार पर सवाल उठाए। जज कविता गंगाधरन ने स्पष्ट किया कि ऐसी FIR केवल उन अपराधों के लिए दर्ज की जा सकती है, जिनमें सात साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो।

अदालत ने FIR में बार-बार बदलाव करने और 'किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम' (Juvenile Justice Act) के प्रावधानों का पालन न करने पर पुलिस को फटकार लगाई। अदालत ने पूछा कि इस मामले में अनिवार्य 'सामाजिक पृष्ठभूमि रिपोर्ट' (social background report) क्यों तैयार नहीं की गई।

जज ने जांच अधिकारी, क्राइम ब्रांच के ACP मनोज कुमार को इस अधिनियम के संबंधित प्रावधान पढ़कर सुनाए और बताया कि कानून के दायरे में आने वाले बच्चों को क्या सुरक्षा और अधिकार प्राप्त हैं।

जज ने कहा कि दबाव में होने पर भी पुलिस कानून के दायरे से बाहर नहीं जा सकती। उन्होंने जांच एजेंसी की इस बात के लिए भी आलोचना की कि जमानत आदेश के खिलाफ अपील करने के लिए वे सही अदालत में जाने के बजाय किसी दूसरी अदालत में चले गए, जबकि नाबालिगों से जुड़े मामलों के लिए एक विशेष अदालत तय है। अदालत ने अभियोजन पक्ष से यह भी पूछा कि अपील खारिज करते समय उन्होंने जुर्माना लगाने की मांग क्यों नहीं की।

इससे पहले, अदालत ने पूरे केरल से ऐसे मामलों का विवरण मांगा था, जिनमें नाबालिग ड्राइवरों से जुड़े हादसों में BNS की धारा 105 (गैर-इरादतन हत्या, जो हत्या की श्रेणी में नहीं आती) लगाई गई हो। जज ने जांच अधिकारी को विवरण देने के लिए एक घंटे का समय दिया और चेतावनी दी कि अगर चेरानल्लूर मामले में इस धारा का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया गया, तो इसके लिए वे खुद जिम्मेदार होंगे।



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