बेंगलुरु। कर्नाटक इस समय गंभीर सूखे की चपेट में है। राज्य में मानसून की भारी कमी ने कृषि, पेयजल आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। ताजा सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के कुल 240 तालुकों में से 226 को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है। यह संख्या राज्य में सूखाग्रस्त तालुकों का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा बताया जा रहा है। वर्ष 2026-27 के दौरान सूखे का प्रभाव 2023-24 के पिछले बड़े संकट से भी अधिक गंभीर होता दिखाई दे रहा है। राज्य सरकार के शुरुआती आकलन में फसलों को लगभग 46 हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान सामने आया है, जबकि कुल क्षति 50 हजार से 60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने भी चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि आने वाले समय में पर्याप्त बारिश की उम्मीद कम है।

240 में से 226 तालुक सूखाग्रस्त घोषित

कर्नाटक में सूखे का दायरा लगातार बढ़ रहा है। राज्य सरकार ने 14 अक्टूबर को नौ और तालुकों को सूखाग्रस्त सूची में शामिल किया। इसके साथ ही प्रभावित तालुकों की संख्या 217 से बढ़कर 226 हो गई।

उपमुख्यमंत्री और राजस्व मंत्री जी. परमेश्वर ने बताया कि नए तालुकों में वास्तविक परिस्थितियों का आकलन पूरा होने के बाद उन्हें सूखाग्रस्त घोषित किया गया है।

राज्य के शेष तालुकों में भी सूखे की स्थिति का आकलन किया जा रहा है। निर्धारित मानकों पर खरा उतरने वाले अन्य क्षेत्रों को भी सूची में शामिल किया जा सकता है।

सरकार का कहना है कि अंतिम नुकसान आकलन तैयार करने की प्रक्रिया जारी है और इसके आधार पर केंद्र सरकार से राहत की मांग की जाएगी।

2023-24 के सूखे का रिकॉर्ड भी पीछे छूटा

कर्नाटक ने वर्ष 2023-24 में भी गंभीर सूखे का सामना किया था। उस दौरान राज्य के तत्कालीन 236 तालुकों में से 223 को सूखाग्रस्त घोषित किया गया था।

इनमें 196 तालुक गंभीर और 27 मध्यम सूखे की श्रेणी में थे। लगभग 46.11 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि पर फसलों को नुकसान पहुंचा था।

इस बार राज्य में 226 तालुक सूखाग्रस्त घोषित किए जा चुके हैं। प्रभावित क्षेत्रों की संख्या के मामले में मौजूदा संकट पिछले बड़े सूखे से आगे निकल गया है।

कृषि क्षेत्र में नुकसान का शुरुआती आकलन भी अत्यंत गंभीर है। हालांकि, वर्ष 2026-27 का अंतिम नुकसान आकलन अभी तैयार नहीं हुआ है। इसलिए दोनों अवधियों की कुल आर्थिक क्षति की अंतिम तुलना सरकारी रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगी।

मानसून में 35 प्रतिशत कम बारिश से बिगड़े हालात

इस साल कर्नाटक में दक्षिण-पश्चिम मानसून उम्मीद के मुताबिक बारिश नहीं ला सका।

मौसम संबंधी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में सामान्य रूप से लगभग 816 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन इस बार केवल करीब 530 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।

इस प्रकार मानसून के दौरान लगभग 35 प्रतिशत वर्षा की कमी रही।

रिपोर्टों के अनुसार, यह वर्ष 1971 के बाद राज्य का सबसे कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून रहा। इससे पहले 2002 में करीब 33 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई थी।

बारिश की कमी ने विशेष रूप से वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों को प्रभावित किया है। समय पर पानी नहीं मिलने से फसलों की वृद्धि और उत्पादन पर गंभीर असर पड़ा है।

47 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि क्षेत्र प्रभावित

राज्य सरकार के शुरुआती आकलन के अनुसार, सूखे के कारण लगभग 47.09 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों को नुकसान पहुंचा है।

इसमें खाद्यान्न, दलहन, तिलहन और अन्य प्रमुख कृषि उपज शामिल हैं।

कई क्षेत्रों में पर्याप्त बारिश नहीं होने से खेतों में खड़ी फसलें प्रभावित हुईं। सिंचाई के सीमित साधनों वाले किसानों की परेशानियां विशेष रूप से बढ़ी हैं।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार वर्षा की कमी से मिट्टी की नमी घट जाती है और फसलों के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

कम उत्पादन की आशंका से किसानों की आमदनी प्रभावित होने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है।

46 हजार करोड़ से अधिक के नुकसान का अनुमान

राज्य सरकार ने शुरुआती 177 सूखाग्रस्त तालुकों में फसल क्षति का आकलन लगभग 46,324.5 करोड़ रुपये किया था।

इसके बाद अन्य क्षेत्रों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया, जिससे कुल नुकसान का अनुमान और बढ़ने की संभावना है।

उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने कहा है कि राज्य में कुल क्षति 50 हजार से 60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।

हालांकि, यह अंतिम आधिकारिक नुकसान राशि नहीं है। नए प्रभावित तालुकों का आकलन पूरा होने के बाद कुल क्षति और राहत की आवश्यकता का स्पष्ट विवरण सामने आएगा।

केंद्र सरकार से मांगी जा रही आर्थिक सहायता

कर्नाटक सरकार ने सूखे से प्रभावित किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए केंद्र से वित्तीय सहायता की मांग की है।

उपमुख्यमंत्री परमेश्वर ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया था।

राज्य सरकार ने शुरुआती चरण में 101 सूखाग्रस्त तालुकों के लिए लगभग 3,705.30 करोड़ रुपये की राहत मांगी थी।

बाद के आकलन के आधार पर केंद्र से लगभग 7,500 करोड़ रुपये की सहायता की आवश्यकता बताई गई।

राज्य सरकार अब अंतिम राहत ज्ञापन तैयार कर रही है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष के निर्धारित मानकों के अनुसार सहायता की राशि तय की जाएगी।

केंद्रीय टीम ने किया प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण

कर्नाटक में सूखे की गंभीर स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार की एक मूल्यांकन टीम ने भी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के संयुक्त सचिव अजीत कुमार साहू के नेतृत्व में टीम ने अक्टूबर के पहले सप्ताह में सूखाग्रस्त इलाकों का निरीक्षण शुरू किया था।

टीम को तीन समूहों में विभाजित कर उत्तर कर्नाटक, मध्य कर्नाटक और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में भेजा गया।

इस निरीक्षण का उद्देश्य फसल क्षति, पानी की उपलब्धता और किसानों की समस्याओं की वास्तविक स्थिति का आकलन करना था।

केंद्रीय टीम के निष्कर्ष राहत संबंधी निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

जलाशयों में घटते पानी से बढ़ी चिंता

सूखे का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है। राज्य के जलाशयों में पानी का स्तर भी चिंता का विषय बन गया है।

ताजा रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक के जलाशयों में उपलब्ध जल भंडारण पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले लगभग 30 प्रतिशत कम है।

यह स्थिति आने वाले महीनों में सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के लिए चुनौती पैदा कर सकती है।

यदि बारिश की कमी बनी रहती है, तो कुछ क्षेत्रों में जल संरक्षण और पानी के उपयोग को लेकर अतिरिक्त व्यवस्थाएं करनी पड़ सकती हैं।

आने वाले महीनों में भी राहत की उम्मीद कम

भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमानों में अक्टूबर और नवंबर के दौरान सामान्य से कम वर्षा की आशंका जताई गई है।

इससे राज्य सरकार की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि मानसून के दौरान पर्याप्त बारिश नहीं होने के बाद जलाशयों और भूजल स्रोतों को दोबारा भरने के लिए अतिरिक्त वर्षा महत्वपूर्ण होती है।

मौसम का यही रुख बना रहा तो रबी फसलों की बुवाई और सिंचाई संबंधी जरूरतों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में जल प्रबंधन, सिंचाई की प्राथमिकताएं और किसानों तक समय पर आर्थिक सहायता पहुंचाना आवश्यक है।

किसानों की राहत और पेयजल व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती

कर्नाटक सरकार के सामने अब सूखे से प्रभावित किसानों को सहायता पहुंचाने, पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करने और पेयजल संकट को रोकने की चुनौती है।

कृषि नुकसान के कारण किसानों की आय प्रभावित होने के साथ स्थानीय बाजारों और ग्रामीण रोजगार पर भी असर पड़ने की आशंका है।

फिलहाल राज्य सरकार अंतिम नुकसान आकलन तैयार कर रही है और केंद्र से राहत हासिल करने के प्रयास जारी हैं।

226 तालुकों के सूखाग्रस्त घोषित होने और हजारों करोड़ रुपये के कृषि नुकसान की आशंका के बीच आने वाले महीनों में सरकार की राहत व्यवस्था और जल प्रबंधन के फैसले बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

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