बेंगलुरु। कर्नाटक में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद अब कैबिनेट में महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। 30 संगठनों के समूह वाले एक छत्र संगठन ‘नवेद्दु निल्लादिद्दरे, कर्नाटक’ (अगर हम नहीं उठते, तो कर्नाटक) ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को पत्र लिखकर राज्य मंत्रिमंडल में महिलाओं की अनुपस्थिति पर चिंता जताई है।
संगठन ने अपने पत्र में कहा है कि 33 सदस्यीय मंत्रिमंडल में एक भी महिला मंत्री को शामिल नहीं किया गया है, जो राज्य में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कैबिनेट विस्तार से थी उम्मीद
संगठन ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि जब डी.के. शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार मंत्रिमंडल का गठन किया गया था, तब भी उसमें किसी महिला को शामिल नहीं किया गया था।
उस समय संगठन ने अपनी चिंता व्यक्त की थी, लेकिन कैबिनेट विस्तार का इंतजार किया गया। उम्मीद थी कि विस्तार के दौरान इस कमी को दूर किया जाएगा और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा।
हालांकि, संगठन का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।
महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर उठाए सवाल
‘नवेद्दु निल्लादिद्दरे, कर्नाटक’ ने कहा कि राज्य की आबादी में महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है और वे सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इसके बावजूद सरकार के सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले मंच यानी कैबिनेट में महिलाओं की अनुपस्थिति लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
संगठन ने मुख्यमंत्री से इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने और भविष्य में महिलाओं को मंत्रिमंडल में शामिल करने की मांग की है।
30 संगठनों का साझा मंच
‘नवेद्दु निल्लादिद्दरे, कर्नाटक’ कई महिला संगठनों, सामाजिक समूहों और नागरिक संगठनों का साझा मंच है। यह संगठन राज्य में महिलाओं के अधिकारों, समान प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को उठाता रहा है।
संगठन का कहना है कि राजनीतिक संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं, बल्कि समानता और लोकतांत्रिक मजबूती के लिए जरूरी है।
कैबिनेट विस्तार के बाद बढ़ी चर्चा
कर्नाटक में हाल ही में हुए कैबिनेट विस्तार में कई नए चेहरों को जगह दी गई। विस्तार के बाद सरकार ने सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की है।
हालांकि, महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने का मुद्दा अब सरकार के सामने नई चुनौती बनकर सामने आया है।
राजनीतिक दलों से भी उठती रही है मांग
देशभर में राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की ओर से लंबे समय से विधानसभाओं और सरकारों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की मांग की जाती रही है।
महिला आरक्षण कानून को लेकर भी राजनीतिक बहस जारी रही है। समर्थकों का कहना है कि महिलाओं की संख्या बढ़ने से नीति निर्माण में अधिक विविधता आएगी।
सरकार के रुख पर नजर
फिलहाल मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की ओर से इस पत्र पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार इस मांग पर क्या कदम उठाती है।
संगठन ने उम्मीद जताई है कि सरकार महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे को गंभीरता से लेगी और भविष्य में मंत्रिमंडल में संतुलन बनाने की दिशा में काम करेगी।
महिला प्रतिनिधित्व बना बड़ा मुद्दा
कर्नाटक की राजनीति में कैबिनेट में महिलाओं की अनुपस्थिति का मुद्दा आने वाले दिनों में और जोर पकड़ सकता है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि सरकारों को केवल चुनावी प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भी महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री शिवकुमार इस मांग पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या आने वाले समय में कर्नाटक कैबिनेट में महिलाओं को जगह मिलती है या नहीं।