बेंगलुरु: एक विनम्र स्टाफ नर्स, जो अपने काम के घंटे बीमारों और पीड़ितों की देखभाल के लिए समर्पित करती है, खुद उस प्रशासन के हाथों पीड़ित हो रही है, जिसे उसके वैध सेवा हितों की रक्षा करनी चाहिए थी।

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य, जिससे एक मॉडल नियोक्ता होने की उम्मीद की जाती है, इस तरह के अभाव के प्रति मूकदर्शक नहीं बना रह सकता है, इसका साधन बनने की तो बात ही दूर है।

न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना और न्यायमूर्ति हेमा कुलकर्णी की खंडपीठ ने अनसूया पी कोटि द्वारा दायर अपील पर सुनवाई के बाद 29 अक्टूबर तक उत्तर कन्नड़ के जिला प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगते हुए ये टिप्पणियां कीं कि उन्हें जाति सत्यापन प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया था।

अनसूया, जो 16 वर्षों से अधिक समय से KIMS, हुबली में काम कर रही हैं, अदालत द्वारा दो बार निर्देश जारी करने के बावजूद, प्रति माह 10,000 रुपये का समेकित वेतन ले रही हैं। इसी तरह 2016 में दायर याचिका के बाद जाति वैधता प्रमाण पत्र मिलने के बाद से नियुक्त कर्मचारियों को 36,000 रुपये से 67,550 रुपये का नियमित वेतनमान मिल रहा है।

 

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