बेंगलुरु। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे और कांग्रेस नेता मोहम्मद हैरिस नलपाड को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणियों से जुड़े मानहानि मामले में फिलहाल राहत मिली है। बेंगलुरु की विशेष अदालत ने दोनों नेताओं के खिलाफ चल रही आपराधिक मानहानि की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी है। बुधवार, 7 अक्टूबर को विशेष न्यायाधीश केबी शिवप्रसाद ने आदेश दिया कि शिकायतकर्ता की कानूनी पात्रता और मजिस्ट्रेट अदालत के पूर्व आदेश की समीक्षा आवश्यक है। अदालत ने अगली सुनवाई 30 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की है। तब तक निचली अदालत में मामले की आगे की कार्यवाही स्थगित रहेगी। हालांकि, अदालत ने मानहानि के आरोपों को खारिज नहीं किया है और न ही दोनों नेताओं को दोषमुक्त किया है।
प्रियांक खड़गे और नलपाड को मिली अंतरिम राहत
बेंगलुरु की सिटी सिविल एवं सेशंस कोर्ट ने गृह मंत्री प्रियांक खड़गे और कांग्रेस नेता मोहम्मद हैरिस नलपाड की ओर से दाखिल पुनरीक्षण याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अंतरिम आदेश जारी किया।
यह विशेष अदालत मौजूदा और पूर्व सांसदों तथा विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई करती है।
मामले में दोनों कांग्रेस नेताओं ने 42वीं अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। मजिस्ट्रेट अदालत ने पहले मानहानि की शिकायत का संज्ञान लेते हुए दोनों नेताओं को समन जारी किए थे।
विशेष अदालत ने अब उस आदेश के आधार पर चल रही आगे की कार्यवाही पर 30 अक्टूबर तक रोक लगा दी है।
RSS पर कथित टिप्पणी से जुड़ा है विवाद
यह पूरा मामला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर की गई कथित टिप्पणियों से संबंधित है।
आरएसएस से जुड़े होने का दावा करने वाले ए. तेजस नामक व्यक्ति ने प्रियांक खड़गे और मोहम्मद हैरिस नलपाड के खिलाफ निजी आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि कांग्रेस नेताओं ने सार्वजनिक बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से आरएसएस तथा उसके सदस्यों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया।
शिकायत में कहा गया कि आरएसएस को गैरकानूनी और असामाजिक गतिविधियों से जोड़ने वाली टिप्पणियों से संगठन की छवि प्रभावित हुई।
हालांकि, ये आरोप शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए हैं। अदालत ने अभी यह तय नहीं किया है कि संबंधित टिप्पणियां कानूनी रूप से मानहानिकारक थीं या नहीं।
27 जून को मजिस्ट्रेट अदालत ने दिया था आदेश
इस मामले में 27 जून 2026 को मजिस्ट्रेट अदालत ने प्रियांक खड़गे की ओर से उठाई गई कानूनी आपत्ति को खारिज कर दिया था।
खड़गे ने दलील दी थी कि आरएसएस एक पंजीकृत संगठन नहीं है और इसमें सदस्यता का कोई औपचारिक पंजीकरण तंत्र नहीं है।
उनका तर्क था कि ऐसी स्थिति में स्वयं को आरएसएस का सदस्य बताने वाला कोई भी व्यक्ति संगठन की ओर से मानहानि का मुकदमा नहीं चला सकता।
हालांकि, मजिस्ट्रेट अदालत ने उनकी दलील स्वीकार नहीं की थी।
अदालत ने माना था कि आरएसएस एक पहचान योग्य संगठन है और उसके सदस्यों की ओर से मानहानि की शिकायत की जा सकती है।
इसके बाद मजिस्ट्रेट ने शिकायत का संज्ञान लेते हुए दोनों कांग्रेस नेताओं को समन जारी करने का आदेश दिया था।
शिकायतकर्ता की सदस्यता पर उठाए सवाल
विशेष अदालत में सुनवाई के दौरान प्रियांक खड़गे के वकील ने शिकायतकर्ता ए. तेजस की आरएसएस सदस्यता को लेकर सवाल उठाए।
उन्होंने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने संगठन के साथ अपने संबंधों को लेकर अलग-अलग विवरण दिए हैं।
बचाव पक्ष का कहना था कि शिकायतकर्ता ने ऐसा पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया है, जिससे यह स्थापित हो सके कि वह वास्तव में आरएसएस का सदस्य है।
अदालत के सामने यह भी तर्क रखा गया कि शिकायतकर्ता की ओर से प्रस्तुत तस्वीरें और सदस्यता संबंधी दस्तावेज आपस में मेल नहीं खाते।
बचाव पक्ष ने कहा कि किसी संगठन की कथित मानहानि के मामले में शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति की कानूनी पात्रता का निर्धारण प्रारंभिक चरण में किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा- शिकायत का अधिकार महत्वपूर्ण सवाल
विशेष न्यायाधीश केबी शिवप्रसाद ने सुनवाई के दौरान माना कि मानहानि के मामले में शिकायतकर्ता की कानूनी पात्रता एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
अदालत ने प्रारंभिक तौर पर मजिस्ट्रेट अदालत के उस दृष्टिकोण से असहमति जताई, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता की पात्रता का सवाल मुकदमे की सुनवाई के दौरान तय किया जा सकता है।
विशेष अदालत ने कहा कि किसी आपराधिक मानहानि के मामले में यह देखना आवश्यक है कि शिकायत दर्ज कराने वाला व्यक्ति संबंधित कानून के अनुसार शिकायत करने का अधिकार रखता है या नहीं।
इसी आधार पर अदालत ने निचली अदालत के आदेश की जांच आवश्यक मानी और आगे की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी।
बचाव पक्ष ने उठाई कानूनी आपत्ति
प्रियांक खड़गे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संदेश जे. चौटा ने अदालत में दलीलें पेश कीं।
उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 222(1) के अनुसार, आपराधिक मानहानि के मामले में सामान्यतः उसी व्यक्ति की शिकायत पर संज्ञान लिया जा सकता है, जो कथित मानहानि से प्रभावित हुआ हो।
वहीं भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 में मानहानि से संबंधित प्रावधान निर्धारित किए गए हैं।
मोहम्मद हैरिस नलपाड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विक्रम हुइलगोल ने भी शिकायतकर्ता के अधिकार पर सवाल उठाए।
बचाव पक्ष ने यह दलील भी दी कि शिकायतकर्ता ने अलग-अलग कथित घटनाओं को एक ही शिकायत में शामिल किया है, जो उनके अनुसार कानूनी रूप से उचित नहीं है।
अदालत ने इन तर्कों पर विचार करने के बाद मामले की आगे की समीक्षा करने का निर्णय लिया।
हाईकोर्ट से भी नहीं मिली थी तत्काल राहत
इससे पहले प्रियांक खड़गे और मोहम्मद हैरिस नलपाड ने मानहानि मामले में राहत पाने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने उस स्तर पर मामले को समाप्त करने का आदेश नहीं दिया।
अदालत ने दोनों नेताओं को मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश के खिलाफ सेशंस कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल करने का विकल्प बताया था।
इसके बाद दोनों नेताओं ने विशेष सेशंस कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां उन्हें फिलहाल अंतरिम राहत मिली है।
30 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई
विशेष अदालत ने शिकायतकर्ता ए. तेजस को नोटिस जारी करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही निचली अदालत से मामले का रिकॉर्ड भी मंगाया गया है।
अब 30 अक्टूबर को अदालत संबंधित दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों पर आगे सुनवाई करेगी।
इस दौरान मुख्य रूप से शिकायतकर्ता की कानूनी पात्रता और मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश की वैधता पर विचार किया जाएगा।
फिलहाल दोनों कांग्रेस नेताओं के खिलाफ निचली अदालत में चल रही कार्यवाही स्थगित है।
यह अंतरिम आदेश होने के कारण मानहानि का मामला समाप्त नहीं हुआ है। आगे की कानूनी प्रक्रिया विशेष अदालत के अगले आदेश पर निर्भर करेगी।