बेलगावी। कर्नाटक में गन्ने की कीमत बढ़ाने की मांग को लेकर चल रहा किसानों का आंदोलन एक बार फिर तेज हो गया है। राज्य रैथा संघ और हसिरू सेना के प्रदेश अध्यक्ष चुनप्पा पुजेरी तथा मानद अध्यक्ष शशिकांत गुरुजी के नेतृत्व में आंदोलनकारी किसानों ने केंद्र सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति की बेंगलुरु में आयोजित बैठक में शामिल नहीं होने का निर्णय लिया है। गुरुवार, 29 अक्टूबर को बेलगावी जिले के मुदलगी तालुक स्थित गुरलापुर क्रॉस पर आंदोलनकारी किसानों की बैठक में यह फैसला लिया गया। किसान नेताओं का कहना है कि यदि केंद्र सरकार वास्तव में उनकी समस्याओं को समझना चाहती है तो समिति को बेंगलुरु में बैठक करने के बजाय आंदोलन स्थल पर पहुंचकर किसानों की बात सुननी चाहिए। किसानों ने स्पष्ट किया कि जब तक गन्ने के उचित मूल्य और अन्य प्रमुख मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

गुरलापुर क्रॉस पर पिछले कई दिनों से बड़ी संख्या में किसान धरना दे रहे हैं। उनका आरोप है कि गन्ने की खेती में लगातार बढ़ती लागत के बावजूद उन्हें उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। किसानों का कहना है कि खाद, बीज, सिंचाई, मजदूरी और परिवहन का खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन गन्ना खरीद मूल्य में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होने से उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है।

राज्य रैथा संघ के अध्यक्ष चुनप्पा पुजेरी ने कहा कि सरकार को किसानों की वास्तविक स्थिति समझने के लिए आंदोलन स्थल पर आना चाहिए। उनका कहना है कि दूर बैठकर बैठकों का आयोजन करने से किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। खेतों में काम करने वाले किसानों और आंदोलन में शामिल लोगों से सीधे बातचीत करना आवश्यक है।

किसान नेताओं के अनुसार, केंद्रीय समिति का गठन गन्ना उत्पादकों की समस्याओं तथा चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत से जुड़े मुद्दों की समीक्षा के लिए किया गया है। समिति का नेतृत्व नीति आयोग के पूर्व सदस्य रमेश चंद कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर को चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। किसानों की मांगों पर विचार करने के लिए समिति को विभिन्न हितधारकों से बातचीत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

किसानों का कहना है कि समिति को उत्तर कर्नाटक के उन क्षेत्रों का दौरा करना चाहिए, जहां गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर होती है। बेलगावी और आसपास के जिलों में बड़ी संख्या में किसान गन्ने की खेती पर निर्भर हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों का तर्क है कि समिति को उनके बीच पहुंचकर उत्पादन लागत, चीनी मिलों की भुगतान व्यवस्था और किसानों की आर्थिक परेशानियों का आकलन करना चाहिए।

आंदोलनकारी किसानों की प्रमुख मांग गन्ने का खरीद मूल्य बढ़ाकर 5,500 रुपये प्रति टन करने की है। किसान संगठनों के अनुसार, चीनी मिलों को गन्ने के लिए 4,500 रुपये प्रति टन का भुगतान करना चाहिए, जबकि राज्य सरकार को अतिरिक्त 1,000 रुपये प्रति टन की सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। उनका कहना है कि ऐसा होने पर किसानों को उत्पादन लागत के अनुरूप बेहतर आर्थिक लाभ मिल सकेगा।

इसके अलावा किसान केंद्र सरकार से चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। वर्तमान में चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 31 रुपये प्रति किलो निर्धारित है। किसान संगठन इसे बढ़ाकर 60 रुपये प्रति किलो करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि चीनी का बिक्री मूल्य बढ़ने से मिलों की भुगतान क्षमता में सुधार हो सकता है और गन्ना उत्पादकों को बेहतर कीमत मिल सकेगी। हालांकि चीनी की कीमत में वृद्धि का उपभोक्ताओं और बाजार पर पड़ने वाला प्रभाव भी नीतिगत निर्णय का महत्वपूर्ण पहलू होगा।

किसान नेताओं ने चीनी के घरेलू और व्यावसायिक उपयोग के लिए अलग-अलग मूल्य निर्धारण व्यवस्था बनाने की मांग भी उठाई है। इसके साथ ही चीनी मिलों में उत्पादित एथेनॉल की खरीद और उसकी कीमतों से संबंधित नीतियों में बदलाव की मांग की जा रही है।

इससे पहले किसानों ने अपनी मांगों को लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया था। 13 और 15 अक्टूबर को किसानों ने पुणे-बेंगलुरु राष्ट्रीय राजमार्ग पर हत्तरगी और हिरेबागेवाड़ी टोल प्लाजा के पास रास्ता रोककर विरोध जताया था। आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में किसान सड़कों पर उतर आए थे।

इसके बाद किसान नेताओं ने केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी से मुलाकात की थी। 18 अक्टूबर की रात शुरू हुई बातचीत 19 अक्टूबर की सुबह तक चली थी। बातचीत के बाद किसानों ने कुछ समय के लिए आंदोलन स्थगित करते हुए सरकार को मांगों पर निर्णय लेने का अवसर दिया था। हालांकि संतोषजनक समाधान नहीं निकलने पर किसानों ने दोबारा विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी किसान प्रतिनिधियों और चीनी मिल संचालकों के साथ बैठक की थी। 26 अक्टूबर को बेलगावी के सुवर्ण विधान सौध में आयोजित इस बैठक में गन्ने की कीमत और अन्य मांगों पर चर्चा हुई, लेकिन कोई अंतिम समाधान नहीं निकल सका।

किसान नेताओं का आरोप है कि सरकार और चीनी मिलों के प्रतिनिधियों के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं, लेकिन किसानों को राहत देने वाला ठोस फैसला नहीं लिया जा रहा है। उनका कहना है कि केवल आश्वासन मिलने से आंदोलन समाप्त नहीं होगा।

गुरुवार को आंदोलनकारियों ने सरकार और चीनी मिल प्रबंधन को मांगों पर निर्णय लेने के लिए 24 घंटे का अतिरिक्त समय देने की घोषणा की। किसान संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि शुक्रवार शाम तक समाधान नहीं निकला तो शनिवार से पुणे-बेंगलुरु राष्ट्रीय राजमार्ग पर फिर से प्रदर्शन किया जा सकता है।

इसके अलावा आंदोलनकारी किसानों ने राज्यव्यापी बंद का आह्वान करने की संभावना भी जताई है। हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय आंदोलन की परिस्थितियों और सरकार की प्रतिक्रिया के आधार पर लिया जाएगा।

आंदोलन के दौरान किसानों ने चीनी मिलों के गोदामों में रखे चीनी के स्टॉक को बाहर भेजने का भी विरोध किया है। कुछ स्थानों पर आंदोलनकारियों ने चीनी गोदामों पर ताले लगाने और माल की आवाजाही रोकने की कार्रवाई की। किसानों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर निर्णय नहीं होता, तब तक वे चीनी मिलों पर दबाव बनाए रखेंगे।

राज्य रैथा संघ के पदाधिकारियों ने अन्य जिलों के किसानों से भी आंदोलन में शामिल होने की अपील की है। किसान नेताओं का दावा है कि इस आंदोलन का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं, बल्कि गन्ना उत्पादकों को उचित मूल्य दिलाना है।

फिलहाल केंद्र सरकार की समिति के सामने गन्ने की कीमत, चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य और एथेनॉल नीति जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। वहीं राज्य सरकार को भी किसान संगठनों और चीनी मिल संचालकों के बीच सहमति बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

गुरलापुर क्रॉस पर जारी आंदोलन के बीच किसानों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। अब देखना होगा कि केंद्र और राज्य सरकार किसानों की मांगों पर क्या निर्णय लेती हैं और क्या केंद्रीय समिति आंदोलन स्थल पर पहुंचकर किसान प्रतिनिधियों से बातचीत करती है। फिलहाल गन्ने की कीमत को लेकर जारी विवाद ने कर्नाटक की कृषि और चीनी उद्योग से जुड़ी गतिविधियों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

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