बेंगलुरु। पश्चिमी घाट में कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों को लागू करने को लेकर लंबे समय से जारी विवाद के समाधान की दिशा में कर्नाटक सरकार का वन और राजस्व भूमि का राज्यव्यापी संयुक्त सर्वे महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। सरकार ने प्रभावित जिलों के विधायकों की मांग को स्वीकार करते हुए वन और गैर-वन क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान के लिए भौतिक सर्वेक्षण कराने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके लिए सरकार ने एक वर्ष का समय मांगा है।

इस कवायद का उद्देश्य जमीन की वास्तविक स्थिति का आकलन कर यह स्पष्ट करना है कि कौन से क्षेत्र वास्तव में वन भूमि हैं और किन इलाकों में बस्तियां, खेती, बागान या अन्य गैर-वन गतिविधियां मौजूद हैं। इसके बाद पश्चिमी घाट में पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान को लेकर अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।

कर्नाटक इस प्रक्रिया में पड़ोसी राज्य केरल में अपनाए गए मॉडल को आधार बना रहा है, जहां जमीनी सर्वे के माध्यम से वन और गैर-वन क्षेत्रों को अलग-अलग पहचानने की कवायद की गई थी।

वन और राजस्व विभाग मिलकर कर रहे सर्वे

राज्य में वन विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारी संयुक्त रूप से जमीनों का सर्वे कर रहे हैं। दोनों विभागों के रिकॉर्ड में कई स्थानों पर जमीन की प्रकृति और सीमाओं को लेकर अंतर होने के कारण वास्तविक स्थिति की पहचान जरूरी मानी जा रही है।

सर्वे के दौरान सरकारी रिकॉर्ड के साथ जमीन की मौजूदा भौतिक स्थिति का मिलान किया जाएगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि रिकॉर्ड में वन क्षेत्र के रूप में दर्ज जमीन पर वर्तमान में किस तरह का उपयोग हो रहा है।

इसी तरह राजस्व भूमि और वन भूमि की सीमाओं को लेकर मौजूद अस्पष्टता भी दूर करने की कोशिश की जाएगी।

प्रभावित जिलों के विधायकों ने उठाई थी मांग

पश्चिमी घाट से जुड़े जिलों के विधायकों की ओर से लंबे समय से मांग की जा रही थी कि पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों का निर्धारण केवल उपग्रह चित्रों या पुराने रिकॉर्ड के आधार पर नहीं किया जाए।

उनका कहना रहा है कि जमीन पर जाकर वास्तविक स्थिति की जांच करना जरूरी है, क्योंकि कई क्षेत्रों में गांव, कृषि भूमि, बागान और लोगों की दूसरी गतिविधियां मौजूद हैं।

इन चिंताओं को देखते हुए सरकार ने भौतिक सर्वेक्षण कराने की मांग स्वीकार की है। इससे प्रभावित इलाकों में वन और गैर-वन क्षेत्र की वास्तविक सीमाओं को स्पष्ट करने का प्रयास किया जाएगा।

केरल की तर्ज पर सर्वे की तैयारी

कर्नाटक सरकार इस मामले में केरल की ओर से अपनाए गए तरीके का अध्ययन कर रही है। केरल ने पश्चिमी घाट से जुड़े पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान के दौरान जमीनी स्तर पर सर्वे और स्थानीय जानकारी का उपयोग किया था।

कर्नाटक में भी इसी तरह भौतिक सत्यापन को महत्व दिया जा रहा है। सरकार का मानना है कि केवल नक्शों और सैटेलाइट डेटा के आधार पर निर्णय लेने के बजाय वास्तविक स्थिति का सर्वे किया जाना चाहिए।

इससे स्थानीय बस्तियों, कृषि क्षेत्रों और वास्तविक वन क्षेत्रों के बीच अंतर अधिक स्पष्ट हो सकता है।

क्या है कस्तूरीरंगन समिति का मामला?

पश्चिमी घाट भारत के सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता क्षेत्रों में शामिल है। इसके संरक्षण के लिए केंद्र सरकार ने विभिन्न विशेषज्ञ समितियों से सुझाव मांगे थे। इनमें डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय कार्यसमूह की रिपोर्ट भी शामिल है।

कस्तूरीरंगन समिति ने पश्चिमी घाट के एक हिस्से को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिह्नित करने की सिफारिश की थी। इन क्षेत्रों में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली कुछ गतिविधियों को नियंत्रित करने या प्रतिबंधित करने की बात कही गई थी।

रिपोर्ट सामने आने के बाद पश्चिमी घाट से जुड़े राज्यों में इस बात को लेकर बहस शुरू हुई कि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों की आजीविका के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

कर्नाटक में लंबे समय से विवाद

कर्नाटक के पश्चिमी घाट वाले कई जिलों में कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों को लेकर लंबे समय से विरोध और चर्चा होती रही है।

स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों की प्रमुख चिंता यह रही है कि यदि आबादी वाले या कृषि क्षेत्रों को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र में शामिल कर लिया जाता है तो भविष्य में जमीन के उपयोग, निर्माण और दूसरी आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

दूसरी ओर पर्यावरण विशेषज्ञ पश्चिमी घाट के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए प्रभावी संरक्षण उपायों की जरूरत पर जोर देते रहे हैं।

ऐसे में सरकार के सामने पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों की आजीविका और जमीन से जुड़े अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।

जमीन की वास्तविक स्थिति होगी स्पष्ट

संयुक्त सर्वे का सबसे बड़ा उद्देश्य जमीन की वास्तविक स्थिति का दस्तावेजीकरण करना है। कई स्थानों पर पुराने सरकारी रिकॉर्ड और वर्तमान जमीनी स्थिति में अंतर हो सकता है।

समय के साथ कुछ क्षेत्रों में बस्तियों का विस्तार हुआ है, जबकि कई जगह कृषि और बागवानी गतिविधियां लंबे समय से जारी हैं। दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में प्राकृतिक वन और जैव विविधता का संरक्षण बेहद महत्वपूर्ण है।

भौतिक सर्वे से ऐसे क्षेत्रों की पहचान अधिक सटीक तरीके से करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

सरकार ने मांगा एक साल का समय

सर्वे का दायरा बड़ा होने के कारण सरकार ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए एक वर्ष का समय मांगा है। इस अवधि में संबंधित जिलों में वन और राजस्व विभाग की टीमें जमीन का निरीक्षण कर रिकॉर्ड तैयार करेंगी।

सर्वे के आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद राज्य सरकार पश्चिमी घाट के पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर अपना रुख और स्पष्ट कर सकेगी।

यह जानकारी केंद्र सरकार के साथ होने वाली आगे की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

स्थानीय लोगों की चिंताओं पर रहेगा फोकस

पश्चिमी घाट के गांवों में रहने वाले लोगों के लिए जमीन का मुद्दा सीधे उनकी आजीविका से जुड़ा है। खेती, बागवानी और अन्य ग्रामीण गतिविधियों के कारण किसी क्षेत्र को वन या गैर-वन घोषित करने का फैसला महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

इसी कारण जनप्रतिनिधि मांग कर रहे थे कि अंतिम निर्णय से पहले स्थानीय परिस्थितियों का भौतिक सत्यापन किया जाए।

संयुक्त सर्वे से स्थानीय स्तर पर मौजूद तथ्यों को सरकारी रिकॉर्ड में शामिल करने का अवसर मिलेगा।

पर्यावरण संरक्षण भी बड़ी चुनौती

पश्चिमी घाट केवल स्थानीय आबादी के लिए ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण भारत के पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है। यहां के जंगल अनेक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र हैं और बड़ी संख्या में दुर्लभ वनस्पतियों तथा वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी हैं।

इसलिए पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान में वैज्ञानिक और सटीक जानकारी बेहद जरूरी है। अत्यधिक विकास या प्राकृतिक क्षेत्रों में अनियंत्रित गतिविधियां जैव विविधता और जल स्रोतों को प्रभावित कर सकती हैं।

सर्वे के नतीजों पर टिकी आगे की प्रक्रिया

राज्यव्यापी संयुक्त सर्वे पूरा होने के बाद वन और गैर-वन क्षेत्रों को लेकर अधिक स्पष्ट डेटा उपलब्ध होने की उम्मीद है। इसके आधार पर सरकार कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों से जुड़े विवादित क्षेत्रों पर आगे निर्णय ले सकेगी।

यदि सर्वे से जमीन की सीमाएं और वास्तविक उपयोग स्पष्ट हो जाता है तो लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने में मदद मिल सकती है।

फिलहाल वन और राजस्व विभाग की संयुक्त कवायद पर पश्चिमी घाट के प्रभावित जिलों के लोगों, जनप्रतिनिधियों और पर्यावरण विशेषज्ञों की नजर है। सर्वे के नतीजे यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं कि पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय आबादी के हितों और आजीविका के बीच किस तरह संतुलन बनाया जाए।

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