बेंगलुरु। कर्नाटक के कोलार और केजीएफ तालुकों में बारिश की कमी और सूखे जैसी परिस्थितियों ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कभी अपनी जमीन पर खेती करके परिवार का पालन-पोषण करने वाले किसान अब आजीविका के लिए दिहाड़ी मजदूरी और डेयरी व्यवसाय का सहारा लेने को मजबूर हैं। लगातार फसलों को नुकसान पहुंचने और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलने के कारण कई परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है। खेती से होने वाली आमदनी अनिश्चित होने के चलते किसानों को रोजमर्रा के खर्च पूरे करने के लिए दूसरे काम तलाशने पड़ रहे हैं।

कोलार तालुक के चामराहल्ली गांव के रहने वाले 56 वर्षीय किसान नागेशप्पा की कहानी इस संकट को सामने लाती है। पिछले साल रागी (मंडुआ) की फसल में नुकसान उठाने के बाद इस बार उन्होंने अपनी तीन एकड़ जमीन पर हरी मिर्च की खेती शुरू की है। हालांकि, मौसम की अनिश्चितता के बीच उन्हें इस फसल से भी अच्छी आमदनी होने की चिंता सता रही है।

खेती के साथ मजदूरी कर रहे नागेशप्पा

नागेशप्पा के परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटे दिनेश तथा नंजुंडा हैं। परिवार की जिम्मेदारियां पूरी करने के लिए वे खेती के साथ दिहाड़ी मजदूरी भी करते हैं।

पिछले साल रागी की फसल खराब होने से उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने फसल बदलकर हरी मिर्च उगाने का फैसला किया। उन्हें उम्मीद है कि इस बार खेती से कुछ आमदनी हो सकेगी।

लेकिन बारिश की कमी ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। कृषि उत्पादन के लिए समय पर पानी उपलब्ध होना जरूरी है। पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है और पैदावार घटने का खतरा रहता है।

ऐसी परिस्थितियों में किसानों की परेशानी केवल फसल खराब होने तक सीमित नहीं रहती। बीज, खाद, मजदूरी और अन्य कृषि कार्यों पर किया गया खर्च भी निकालना मुश्किल हो जाता है।

कभी दूसरों का पेट भरते थे, अब खुद रोजगार की तलाश

कोलार और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि लंबे समय से आजीविका का प्रमुख साधन रही है। किसान अपनी जरूरतों के साथ बाजार के लिए भी अनाज, सब्जियां और अन्य फसलें पैदा करते रहे हैं।

लेकिन बार-बार बारिश कम होने और पानी के स्रोतों पर दबाव बढ़ने से कृषि पर निर्भर परिवारों की मुश्किलें बढ़ी हैं।

जिन किसानों की नियमित आमदनी खेती से होती थी, उन्हें अब निर्माण कार्य, खेतिहर मजदूरी और अन्य अस्थायी रोजगार के विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं।

दिहाड़ी मजदूरी से मिलने वाली आय भी हमेशा निश्चित नहीं होती। काम उपलब्ध होने पर ही मजदूरी मिलती है। ऐसे में परिवार का खर्च चलाने के साथ अगली फसल के लिए पैसा बचाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

कृषि संकट का असर पूरे ग्रामीण जीवन पर पड़ता है। खेती से कमाई घटने पर किसानों की खरीदने की क्षमता कमजोर होती है, जिससे गांवों के छोटे व्यापार और स्थानीय रोजगार भी प्रभावित हो सकते हैं।

टमाटर उत्पादकों को भी नुकसान

सूखे जैसी परिस्थितियों का असर केवल रागी या मिर्च की खेती करने वाले किसानों पर नहीं पड़ा है। सब्जियों की खेती से जुड़े किसानों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

टी गोल्लाहल्ली गांव के 55 वर्षीय किसान नारायणस्वामी ने बताया कि सूखे के कारण उनकी टमाटर की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है।

टमाटर को ऐसी फसल माना जाता है, जिसके उत्पादन में समय पर सिंचाई और नियमित देखभाल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पानी की कमी से पौधों और फलों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

इसके अलावा, सब्जियों की खेती में किसानों को बाजार भाव के उतार-चढ़ाव का जोखिम भी उठाना पड़ता है। यदि उत्पादन कम हो जाए या बाजार में उचित कीमत न मिले, तो नुकसान और बढ़ सकता है।

बारिश की कमी से बिगड़ा कृषि का गणित

इस साल कर्नाटक के कई जिलों में मानसूनी बारिश की कमी दर्ज की गई है। सितंबर में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, कोलार जिला भी गंभीर वर्षा कमी वाले जिलों में शामिल था।

कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा निगरानी केंद्र के आंकड़ों के आधार पर प्रकाशित रिपोर्ट में कोलार जिले में सामान्य से लगभग 56 प्रतिशत कम बारिश होने की जानकारी दी गई थी।

कम बारिश का सबसे अधिक प्रभाव वर्षा आधारित खेती पर पड़ता है। जिन किसानों के पास भरोसेमंद सिंचाई की व्यवस्था नहीं है, उन्हें फसल बोने से लेकर उसकी कटाई तक मौसम पर निर्भर रहना पड़ता है।

बारिश देर से होने पर बुवाई प्रभावित होती है। यदि बुवाई के बाद लंबे समय तक पानी नहीं मिले, तो फसल सूखने का खतरा रहता है।

कई बार किसान दोबारा बुवाई करने का प्रयास करते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। ऐसे में छोटी जोत वाले किसानों के सामने आर्थिक संकट और गहरा सकता है।

डेयरी पालन बना आमदनी का दूसरा सहारा

कोलार क्षेत्र में खेती के साथ पशुपालन भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जिला प्रशासन की जानकारी के अनुसार, डेयरी, रेशम उत्पादन और फूलों की खेती यहां रोजगार के प्रमुख साधनों में शामिल हैं।

खेती में नुकसान उठाने वाले कुछ किसान डेयरी पालन के जरिए नियमित आय प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं। दूध बेचने से मिलने वाली रकम घरेलू जरूरतें पूरी करने में मददगार हो सकती है।

हालांकि, सूखा पशुपालन को भी प्रभावित करता है। हरे चारे की कमी और पशुओं के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होने पर दूध उत्पादन घटने का खतरा रहता है।

यदि किसानों को चारा बाजार से खरीदना पड़े, तो पशुओं के रखरखाव का खर्च बढ़ सकता है। इससे डेयरी व्यवसाय से होने वाला वास्तविक लाभ भी कम हो जाता है।

यही कारण है कि सूखे की स्थिति में कृषि और पशुपालन दोनों के लिए राहत उपाय आवश्यक हो जाते हैं।

फसल नुकसान का आकलन भी हुआ

कोलार जिले में वर्षा की कमी और फसलों पर उसके असर का प्रशासनिक स्तर पर आकलन किया गया है। अगस्त में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, जिला प्रशासन ने सूखे से संबंधित संयुक्त फसल सर्वेक्षण की रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी थी।

उस समय सर्वेक्षण में शामिल क्षेत्रों की लगभग 8,722 हेक्टेयर कृषि भूमि में से करीब 6,888 हेक्टेयर पर मानसून की विफलता के कारण बुवाई नहीं हो पाने की जानकारी दी गई थी।

रिपोर्ट में रागी और मूंगफली जैसी फसलों के प्रभावित होने की बात भी सामने आई थी।

इन परिस्थितियों में किसानों के लिए फसल नुकसान का पारदर्शी आकलन, राहत सहायता, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और जल संरक्षण जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

किसानों को राहत की उम्मीद

कोलार और केजीएफ के किसानों की परेशानी यह बताती है कि वर्षा की कमी केवल कृषि उत्पादन की समस्या नहीं है, बल्कि इससे हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी होती है।

नागेशप्पा जैसे किसान अब भी अपनी जमीन पर खेती जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए उन्हें मजदूरी का सहारा लेना पड़ रहा है।

किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खेती से स्थिर आमदनी प्राप्त करना है। जब तक पर्याप्त सिंचाई, जल संरक्षण और जोखिम से बचाव की सुविधाएं मजबूत नहीं होंगी, तब तक मौसम की मार उनके लिए बड़ी चिंता बनी रह सकती है।

फिलहाल कोलार के किसानों की निगाहें मौसम के साथ सरकारी राहत और भविष्य की सिंचाई योजनाओं पर टिकी हैं। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले समय में परिस्थितियां सुधरेंगी और खेती फिर से उनके परिवारों की आजीविका का भरोसेमंद आधार बन सकेगी।

Tags: