मैसूर। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने रविवार को मैसूर दशहरा को शक्ति, ज्ञान, संस्कृति और समानता का संगम बताया। उन्होंने कहा कि शक्ति से उपलब्धि मिलती है, ज्ञान से विकास होता है, संस्कृति से समानता को बढ़ावा मिलता है और समानता से शांति स्थापित होती है। मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार दशहरा समारोह में संबोधित करते हुए उन्होंने पर्व के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया। साथ ही, उन्होंने इस साल दशहरा कार्यक्रम के अंतर्गत कंबाला आयोजित करने के अपने फैसले का बचाव भी किया।

शिवकुमार ने कहा कि कंबाला का आयोजन विजयनगर काल की सांस्कृतिक विरासत को याद करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आलोचनाओं के बावजूद यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। उनके संबोधन में धार्मिक आस्था, शिक्षा, मानवता और सांस्कृतिक परंपराओं के महत्व पर भी जोर दिया गया।

चार सिद्धांतों से जुड़ा है मैसूर दशहरा

डी.के. शिवकुमार ने अपने संबोधन में कहा कि मैसूर दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाले चार महत्वपूर्ण सिद्धांतों का प्रतीक है। उनके अनुसार, शक्ति, ज्ञान, संस्कृति और समानता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और समाज की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि शक्ति से उपलब्धि हासिल होती है, ज्ञान से विकास का रास्ता खुलता है, संस्कृति समानता की भावना को मजबूत करती है और समानता से शांति स्थापित होती है। इस तरह दशहरा समाज में सकारात्मक बदलाव और सामूहिक प्रगति का संदेश देता है।

उनके संबोधन का मुख्य उद्देश्य दशहरा पर्व को व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना रहा। उन्होंने इस अवसर पर परंपराओं के महत्व के साथ शिक्षा, समानता और मानवता जैसे मूल्यों पर भी ध्यान केंद्रित किया।

कंबाला आयोजन के फैसले का किया बचाव

मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने इस साल मैसूर दशहरा कार्यक्रम के दौरान कंबाला आयोजित करने के अपने फैसले का भी बचाव किया। कंबाला कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों से जुड़ा पारंपरिक भैंसों की दौड़ का आयोजन है। शिवकुमार ने कहा कि इसे दशहरा कार्यक्रम में शामिल करने का उद्देश्य विजयनगर काल की सांस्कृतिक विरासत को याद करना है।

उन्होंने बताया कि आलोचनाओं के बावजूद कंबाला का आयोजन किया जा रहा है। उनके अनुसार, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं को याद रखना महत्वपूर्ण है। ऐसे आयोजन क्षेत्रीय परंपराओं और समाज की सांस्कृतिक पहचान को सामने लाने का अवसर देते हैं।

कंबाला को दशहरा कार्यक्रम में शामिल करने के फैसले पर उठी आलोचनाओं के बीच शिवकुमार ने इसके आयोजन के पीछे का उद्देश्य स्पष्ट किया। उन्होंने इसे सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा कार्यक्रम बताते हुए आयोजन जारी रखने की बात कही।

शिक्षा और ज्ञान पर दिया जोर

अपने भाषण में शिवकुमार ने शिक्षा के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा ज्ञान के कांटे से अज्ञानता के कांटे को हटाती है, तो दशहरा धर्म के कांटे से अधर्म के कांटे को हटाता है।

इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने ज्ञान और धार्मिक मूल्यों के बीच समानता स्थापित करने की कोशिश की। उनका संदेश था कि जिस तरह शिक्षा अज्ञानता दूर करके व्यक्ति को आगे बढ़ने में सहायता करती है, उसी तरह दशहरा अच्छाई की स्थापना और बुराई को दूर करने का प्रतीक है।

शिक्षा और ज्ञान को विकास से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि समाज की प्रगति के लिए ज्ञान जरूरी है। दशहरा जैसे पर्व लोगों को अच्छे मूल्यों को अपनाने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का अवसर देते हैं।

भक्ति के साथ मानवता भी जरूरी

डी.के. शिवकुमार ने अपने संबोधन में भक्ति और मानवता के संबंध पर भी बात की। उन्होंने कहा, “अगर मंदिर में भगवान को देखना भक्ति है, तो इंसानों में भगवान को देखना मानवता है।”

इस कथन के माध्यम से उन्होंने लोगों को धार्मिक आस्था के साथ दूसरे मनुष्यों के प्रति सम्मान और संवेदना रखने का संदेश दिया। उनके अनुसार, ईश्वर के प्रति श्रद्धा के साथ समाज के लोगों के प्रति मानवीय व्यवहार भी महत्वपूर्ण है।

यह विचार उनके उस संदेश से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने समानता को शांति का आधार बताया। समाज में समानता और परस्पर सम्मान को बढ़ावा देने से लोगों के बीच बेहतर संबंध स्थापित हो सकते हैं।

दशहरा से सामाजिक मूल्यों का संदेश

मैसूर दशहरा कर्नाटक का एक प्रमुख सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव है। इस अवसर पर डी.के. शिवकुमार ने परंपराओं, शिक्षा, समानता और मानवता के महत्व को सामने रखा। उन्होंने कहा कि शक्ति, ज्ञान, संस्कृति और समानता के सिद्धांत समाज की प्रगति में अहम भूमिका निभाते हैं।

कंबाला के आयोजन को लेकर उन्होंने विजयनगर काल की सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख किया और आलोचनाओं के बावजूद कार्यक्रम आयोजित करने की बात कही। उनके संबोधन में यह संदेश भी शामिल था कि पर्वों का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि उनसे जुड़े सामाजिक और नैतिक मूल्यों में भी है।

शिवकुमार के भाषण का केंद्र समाज में विकास, समानता और शांति की स्थापना रहा। उन्होंने शिक्षा को अज्ञानता दूर करने का माध्यम और मानवता को सच्ची भक्ति का महत्वपूर्ण रूप बताया।

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