मैसूर। कर्नाटक के विश्व प्रसिद्ध मैसूर दशहरा समारोह में एक खास दृश्य देखने को मिला, जब डी.के. शिवकुमार ने अपने स्वागत के लिए लाई गई फूलों की माला पहनने से इनकार कर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि माला उनके गले में डालने के बजाय पवित्र नंदी ध्वज पर अर्पित की जाए। पारंपरिक मैसूर पगड़ी पहने शिवकुमार ने नंदी ध्वज की पूजा-अर्चना भी की। इस दौरान उन्हें माता चामुंडेश्वरी की मूर्ति भेंट की गई। दशहरा जुलूस से जुड़े इस आयोजन में धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का विशेष महत्व देखने को मिला।

नंदी ध्वज की पूजा के साथ धार्मिक परंपराओं का निर्वहन

मैसूर दशहरा कर्नाटक के सबसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में से एक है। इस उत्सव का विशेष आकर्षण पारंपरिक दशहरा जुलूस होता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक मैसूर पहुंचते हैं।

दशहरा जुलूस से जुड़े कार्यक्रम में डी.के. शिवकुमार ने नंदी ध्वज की पूजा की। नंदी ध्वज का मैसूर दशहरा की पारंपरिक रस्मों में विशेष स्थान है।

पूजा-अर्चना के दौरान उन्होंने आयोजन की धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान व्यक्त किया। इस अवसर पर उनका पारंपरिक पहनावा भी आकर्षण का केंद्र बना।

खुद माला पहनने से किया इनकार

समारोह के दौरान डी.के. शिवकुमार के स्वागत के लिए फूलों की माला लाई गई थी।

लेकिन उन्होंने माला पहनने से इनकार कर दिया और उसे नंदी ध्वज पर चढ़ाने का सुझाव दिया।

उनके इस व्यवहार ने समारोह में मौजूद लोगों का ध्यान खींचा।

सार्वजनिक आयोजनों में अतिथियों का फूलों की माला पहनाकर स्वागत करने की परंपरा रही है। हालांकि, इस अवसर पर शिवकुमार ने व्यक्तिगत स्वागत के बजाय धार्मिक प्रतीक को प्राथमिकता दी।

उनका यह कदम आयोजन की सांस्कृतिक और धार्मिक भावना से जुड़ा हुआ दिखाई दिया।

मैसूर की पारंपरिक पगड़ी में दिखे शिवकुमार

डी.के. शिवकुमार ने समारोह में मैसूर की पारंपरिक पगड़ी पहनी थी।

मैसूर की पगड़ी कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई है। विशेष अवसरों और सम्मान समारोहों में इस पारंपरिक पहनावे का महत्वपूर्ण स्थान है।

दशहरा जैसे ऐतिहासिक आयोजन में पारंपरिक पगड़ी पहनना स्थानीय विरासत के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

शिवकुमार का यह रूप भी समारोह की चर्चा का हिस्सा बना।

उनकी पगड़ी, नंदी ध्वज की पूजा और फूलों की माला को ध्वज पर अर्पित करने का सुझाव आयोजन के प्रमुख आकर्षण रहे।

माता चामुंडेश्वरी की प्रतिमा भेंट की गई

कार्यक्रम के दौरान डी.के. शिवकुमार को माता चामुंडेश्वरी की मूर्ति भेंट की गई।

मैसूर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में माता चामुंडेश्वरी का विशेष महत्व है। उन्हें मैसूर की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।

दशहरा उत्सव में देवी चामुंडेश्वरी की पूजा प्रमुख परंपराओं में शामिल है।

ऐसे में शिवकुमार को देवी की मूर्ति भेंट किया जाना समारोह के धार्मिक महत्व को भी दर्शाता है।

भव्य जंबू सवारी बनी आकर्षण का केंद्र

मैसूर दशहरा के अंतिम दिन निकलने वाली जंबू सवारी इस आयोजन का सबसे प्रमुख आकर्षण है।

इसमें सजे-धजे हाथियों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और सांस्कृतिक दलों की भागीदारी होती है।

वर्ष 2026 के आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार, 21 अक्टूबर को दोपहर 1:36 बजे से 1:56 बजे के बीच नंदी ध्वज पूजा का समय निर्धारित था। इसके बाद देवी चामुंडेश्वरी को पुष्पांजलि अर्पित करने और शाम 4:35 बजे जुलूस रवाना करने का कार्यक्रम रखा गया था।

मैसूर की ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ा उत्सव

मैसूर दशहरा का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है। यह उत्सव कर्नाटक की सांस्कृतिक विरासत और राजपरंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

विजयादशमी के अवसर पर आयोजित जुलूस बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है।

इस दौरान मैसूर महल, पारंपरिक सजावट, धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां उत्सव की भव्यता बढ़ाते हैं।

दशहरा का यह आयोजन कर्नाटक की लोककलाओं और ऐतिहासिक परंपराओं को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का माध्यम भी है।

धार्मिक आस्था और परंपरा का दिखा संगम

डी.के. शिवकुमार की नंदी ध्वज पूजा, पारंपरिक पगड़ी और फूलों की माला को ध्वज पर चढ़ाने का सुझाव इस बार के समारोह की उल्लेखनीय घटनाओं में शामिल रहा।

उनका यह व्यवहार धार्मिक आस्था और परंपराओं के प्रति सम्मान से जुड़ा दिखाई दिया।

मैसूर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण उत्सव भी है।

इस बार समारोह में शिवकुमार का माला पहनने से इनकार करना और उसे नंदी ध्वज पर अर्पित करने का सुझाव देना विशेष रूप से चर्चा में रहा। वहीं, माता चामुंडेश्वरी की मूर्ति भेंट किए जाने से आयोजन का धार्मिक महत्व भी सामने आया।

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