राज्य में शुरू होगा ‘बोरवेल सुरक्षा अभियान’, खुले और बेकार बोरवेल पर कसेगा शिकंजा
बेंगलुरु: छोटे सिंचाई और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. अजय धर्मसिंह ने राज्य में खुले, बेकार और इस्तेमाल के लायक न रहने वाले बोरवेल को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि ऐसे बोरवेल बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं और मवेशियों के लिए भी बड़ा खतरा पैदा करते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए लघु सिंचाई और भूजल विकास विभाग पूरे राज्य में ‘बोरवेल सुरक्षा अभियान’ शुरू करने की योजना बना रहा है।
मंत्री ने भूजल विकास निदेशालय को इस अभियान की विस्तृत रूपरेखा तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इसमें अभियान को किस तरह लागू किया जाएगा, खुले और अनुपयोगी बोरवेल की पहचान कैसे की जाएगी, विभागीय डेटा कैसे जुटाया जाएगा और पूरे अभियान की निगरानी किस स्तर पर होगी, इन सभी बिंदुओं को शामिल करने को कहा गया है।
डॉ. अजय धर्मसिंह ने कहा कि कई बार बोरवेल खोदने के बाद उसमें पानी नहीं मिलता या वह कुछ समय बाद इस्तेमाल के लायक नहीं रहता। ऐसे मामलों में बोरवेल को खुला छोड़ देना गंभीर खतरा बन सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में छोटे बच्चे खेलते समय खुले बोरवेल में गिर सकते हैं। इसके अलावा पशुओं के भी ऐसे गड्ढों में गिरने की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि कोई भी अनुपयोगी बोरवेल खुला नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यदि बोरवेल में पानी उपलब्ध नहीं है या उसका उपयोग बंद कर दिया गया है, तो उसे तय मानकों के अनुसार सुरक्षित रूप से बंद करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी खुले और अनुपयोगी बोरवेल को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश दिए हैं। इन्हीं निर्देशों के आधार पर राज्य ने सुरक्षा उपायों और निगरानी व्यवस्था के लिए कानूनी प्रावधान किए हैं।
इसके बावजूद मंत्री ने माना कि ऐसे कई बोरवेल हो सकते हैं, जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हैं या जिन्हें सही तरीके से बंद नहीं किया गया है। ऐसे ही बोरवेल सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
इसी वजह से प्रस्तावित ‘बोरवेल सुरक्षा अभियान’ केवल सरकारी रिकॉर्ड की जांच तक सीमित नहीं रहेगा। विभाग को जमीन स्तर पर जाकर वास्तविक स्थिति का पता लगाने की जरूरत होगी।
अभियान के तहत गांव, कस्बों और शहरों में ऐसे बोरवेल की पहचान की जा सकती है, जो लंबे समय से इस्तेमाल में नहीं हैं। स्थानीय निकायों, पंचायतों और राजस्व विभाग की मदद से इनका डेटा तैयार किया जा सकता है।
मंत्री ने निर्देश दिया है कि भूजल विकास निदेशालय विस्तृत कार्ययोजना तैयार करे, ताकि अभियान केवल कागजी प्रक्रिया बनकर न रह जाए। हर जिले और स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी तय करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
बोरवेल सुरक्षा का मुद्दा देश के कई राज्यों में समय-समय पर गंभीर रूप से सामने आता रहा है। खुले बोरवेल में बच्चों के गिरने के बाद कई बार लंबा रेस्क्यू अभियान चलाना पड़ता है। कई मामलों में घंटों और दिनों तक राहत-बचाव कार्य चलने के बावजूद जान बचाना मुश्किल हो जाता है।
ऐसी घटनाओं के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि अनुपयोगी बोरवेल को समय रहते सुरक्षित क्यों नहीं किया गया। मंत्री का कहना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए रोकथाम पर जोर देना जरूरी है।
अभियान में बोरवेल मालिकों की जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है। यदि किसी निजी भूमि पर बोरवेल खोदा गया है और उसका उपयोग नहीं हो रहा है, तो संबंधित व्यक्ति को उसे सुरक्षित तरीके से बंद करना होगा।
इसके अलावा नए बोरवेल की खुदाई के दौरान भी नियमों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाएगा। विभाग यह देखेगा कि ड्रिलिंग के बाद बोरवेल की स्थिति रिकॉर्ड में दर्ज की जाए और यदि वह असफल रहता है तो उसे तुरंत बंद किया जाए।
मंत्री ने विभागीय अधिकारियों से यह भी कहा है कि निगरानी के लिए एक स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए। केवल एक बार सर्वे करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। नए बोरवेल और पुराने बोरवेल की स्थिति की लगातार जानकारी रखनी होगी।
इस काम में तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। जीपीएस लोकेशन, डिजिटल रजिस्टर और मोबाइल ऐप जैसी व्यवस्था से बोरवेल का रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है।
साथ ही जिला स्तर पर नियंत्रण कक्ष या निगरानी समिति बनाए जाने की संभावना भी देखी जा सकती है। इससे शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई की जा सकेगी।
ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान भी महत्वपूर्ण होगा। कई बार लोग बोरवेल बंद करने की प्रक्रिया और इससे जुड़े खतरे को गंभीरता से नहीं लेते। यदि पंचायत और स्थानीय स्तर पर लोगों को इसके बारे में समझाया जाए तो कई हादसों को पहले ही रोका जा सकता है।
बोरवेल सुरक्षा अभियान में स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों और ग्रामीण संगठनों को भी जोड़ा जा सकता है। बच्चों और परिवारों को खुले बोरवेल से दूर रहने की सलाह दी जा सकती है।
मंत्री ने कहा कि विभाग इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं बल्कि जनसुरक्षा के सवाल के रूप में देख रहा है। बच्चों और मवेशियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है।
अब भूजल विकास निदेशालय की ओर से विस्तृत कार्य योजना तैयार की जाएगी। इसके आधार पर अभियान की शुरुआत की जाएगी और जिलों को जरूरी निर्देश जारी किए जाएंगे।
यदि अभियान प्रभावी तरीके से लागू होता है तो राज्य में खुले और अनुपयोगी बोरवेल की पहचान और बंद करने की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ सकती है।
फिलहाल सरकार का फोकस ऐसे सभी बोरवेल का पता लगाने पर है, जो रिकॉर्ड से बाहर हैं या सही तरीके से बंद नहीं किए गए हैं।