सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने रद्द किया मानहानि केस
बेंगलुरु। कर्नाटक की राजनीति से जुड़े बहुचर्चित '40 प्रतिशत कमीशन सरकार' विज्ञापन मामले में कांग्रेस को बड़ी कानूनी राहत मिली है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर से कांग्रेस नेताओं के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि के मामले को खारिज कर दिया है। यह मामला वर्ष 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा प्रकाशित विज्ञापनों से जुड़ा था, जिनमें तत्कालीन भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार और सरकारी कार्यों में कमीशनखोरी के गंभीर आरोप लगाए गए थे।बुधवार, 4 नवंबर 2026 को न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी), कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ आपराधिक मानहानि की कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत के इस फैसले से करीब तीन साल पुराने राजनीतिक और कानूनी विवाद में कांग्रेस नेताओं को महत्वपूर्ण राहत मिली है। हालांकि, फैसले का विस्तृत आदेश सामने आना बाकी है।
2023 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा है मामला
दरअसल, वर्ष 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ व्यापक चुनावी अभियान चलाया था। कांग्रेस ने राज्य में भ्रष्टाचार को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाते हुए भाजपा सरकार को '40 प्रतिशत कमीशन सरकार' बताया था।कांग्रेस ने विभिन्न समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित कर आरोप लगाया था कि तत्कालीन सरकार में सरकारी ठेके, सार्वजनिक निर्माण कार्य, नियुक्तियों और अन्य सरकारी प्रक्रियाओं में कथित तौर पर कमीशन लिया जाता था।इन विज्ञापनों में 'करप्शन रेट कार्ड' का भी उल्लेख किया गया था। इसके जरिए कांग्रेस ने दावा किया था कि विभिन्न सरकारी कार्यों के लिए रिश्वत और कमीशन की कथित दरें निर्धारित थीं।कांग्रेस के इन आरोपों ने चुनाव प्रचार के दौरान बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया था। भाजपा ने आरोपों को झूठा और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए उनका विरोध किया था।
भाजपा ने दर्ज कराया था मानहानि का मामला
कांग्रेस के चुनावी विज्ञापनों को लेकर भाजपा की कर्नाटक इकाई ने मई 2023 में आपराधिक मानहानि की निजी शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कांग्रेस नेताओं राहुल गांधी, सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी को पक्षकार बनाया गया था।भाजपा का आरोप था कि कांग्रेस द्वारा प्रकाशित विज्ञापनों में तत्कालीन राज्य सरकार के खिलाफ झूठे और निराधार आरोप लगाए गए। पार्टी ने दावा किया कि इन विज्ञापनों के कारण उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।भाजपा की शिकायत में यह भी कहा गया था कि कांग्रेस ने चुनाव के दौरान जानबूझकर ऐसे विज्ञापन प्रकाशित किए, जिनका उद्देश्य जनता के बीच पार्टी की छवि खराब करना और चुनावी संभावनाओं को प्रभावित करना था।भाजपा ने विज्ञापनों में इस्तेमाल किए गए 'ट्रबल इंजन सरकार' जैसे राजनीतिक नारों पर भी आपत्ति जताई थी। उसका आरोप था कि कांग्रेस ने 'डबल इंजन सरकार' के नारे को बदलकर भाजपा की छवि धूमिल करने का प्रयास किया।
हाईकोर्ट पहुंचे थे कांग्रेस नेता
निचली अदालत में मानहानि की कार्यवाही शुरू होने के बाद कांग्रेस नेताओं ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।कांग्रेस नेताओं की ओर से दलील दी गई कि विज्ञापनों में लगाए गए आरोप तत्कालीन भाजपा सरकार के कामकाज और उसके मंत्रियों से संबंधित थे। उनका कहना था कि सरकार की कार्यप्रणाली की आलोचना को सीधे किसी राजनीतिक दल की आपराधिक मानहानि के रूप में नहीं देखा जा सकता।याचिकाकर्ताओं ने यह सवाल भी उठाया कि क्या भाजपा इस मामले में सीधे प्रभावित पक्ष के रूप में आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराने की कानूनी पात्रता रखती है।कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि यह शिकायत उन्हें परेशान करने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई थी। उन्होंने हाईकोर्ट से आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने का अनुरोध किया था।मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने कांग्रेस नेताओं की याचिकाएं स्वीकार कर लीं और संबंधित आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का आदेश दिया।हालांकि, अदालत के विस्तृत फैसले के उपलब्ध होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कार्यवाही रद्द करने के लिए किन कानूनी आधारों को निर्णायक माना गया है।
राहुल गांधी को पहले ही मिल चुकी थी राहत
इस मामले में कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को पहले ही हाईकोर्ट से राहत मिल चुकी थी।17 फरवरी 2026 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने राहुल गांधी के खिलाफ चल रही आपराधिक मानहानि की कार्यवाही रद्द कर दी थी।राहुल गांधी पर भी वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी आरोप लगाने और विवादित चुनावी विज्ञापनों से जुड़े होने का आरोप था।अब सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के खिलाफ भी कार्यवाही समाप्त होने से इस मामले में कांग्रेस पक्ष को व्यापक कानूनी राहत मिली है।
चुनावी प्रचार में बड़ा मुद्दा बना था कमीशन का आरोप
कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोप राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे थे।कांग्रेस ने तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाया था। चुनावी सभाओं, प्रचार सामग्री और विज्ञापनों में सरकारी कार्यों में कथित कमीशन लेने के आरोपों को लगातार उठाया गया।दूसरी ओर, भाजपा इन आरोपों को आधारहीन बताती रही और कांग्रेस पर भ्रामक प्रचार करने का आरोप लगाती रही।चुनाव के दौरान दोनों दलों के बीच तीखी बयानबाजी हुई थी। कांग्रेस ने अपने अभियान में प्रशासनिक पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मतदाताओं का समर्थन मांगा था।वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बहुमत हासिल कर राज्य में सरकार बनाई थी। हालांकि, चुनावी परिणाम और मानहानि मामले में हाईकोर्ट के फैसले को अलग-अलग संदर्भों में देखना जरूरी है।
राजनीतिक आलोचना और मानहानि के बीच कानूनी बहस
इस मामले ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी प्रचार के दौरान लगाए जाने वाले आरोपों और आपराधिक मानहानि कानून के बीच संबंध को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं।लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्षी दल सरकार की नीतियों, प्रशासनिक फैसलों और कथित भ्रष्टाचार पर सवाल उठाते हैं। वहीं, किसी व्यक्ति या संस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले आरोपों को लेकर मानहानि कानून के तहत न्यायिक उपचार का प्रावधान भी मौजूद है।ऐसी परिस्थितियों में राजनीतिक आलोचना और कानूनी रूप से मानहानिकारक आरोपों के बीच अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है।हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हाईकोर्ट द्वारा मानहानि की कार्यवाही रद्द किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार संबंधी आरोप न्यायिक रूप से सत्य प्रमाणित हो गए हैं।अदालत का मौजूदा निर्णय संबंधित आपराधिक मानहानि की कार्यवाही को समाप्त करने से जुड़ा है।
कांग्रेस को कानूनी राहत, विस्तृत आदेश का इंतजार
कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले को कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत माना जा रहा है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ यह विवाद लंबे समय तक अदालत में लंबित रहा।अब न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की पीठ द्वारा कार्यवाही रद्द किए जाने के बाद इस मामले में कांग्रेस नेताओं को राहत मिली है।फिलहाल अदालत के विस्तृत आदेश का इंतजार किया जा रहा है। उसके सामने आने के बाद फैसले के कानूनी आधार और भविष्य में ऐसे मामलों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकेगा।