सरकारी स्कूल में खराब जूते बांटने का आरोप, आर. अशोक ने कांग्रेस सरकार को घेरा
बेंगलुरु। कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता और भाजपा नेता आर. अशोक ने सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को दिए जा रहे जूतों की गुणवत्ता को लेकर कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर कन्नड़ जिले के मुंडागोड तालुक स्थित बेडासागांव सरकारी हायर प्राइमरी स्कूल में बच्चों को खराब गुणवत्ता के जूते दिए गए। स्थानीय स्तर पर विद्यार्थियों, अभिभावकों और स्कूल डेवलपमेंट एंड मॉनिटरिंग कमेटी (SDMC) के सदस्यों ने भी जूतों की गुणवत्ता पर आपत्ति जताई है।
बेडासागांव स्कूल में विवाद उस समय सामने आया, जब विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों ने सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए जूतों को पहनने योग्य नहीं बताते हुए विरोध किया। स्कूल के सामने जूते फेंककर नाराजगी जताई गई। प्रदर्शन में विद्यार्थियों के साथ SDMC के अध्यक्ष, सदस्य और अभिभावक भी शामिल हुए। उनकी मांग है कि उपलब्ध कराए गए जूतों को वापस लेकर बेहतर गुणवत्ता के जूते दिए जाएं।
स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक स्कूल परिसर में इस मुद्दे को लेकर एक बैठक भी हुई। इसमें जूतों की गुणवत्ता पर चर्चा की गई और संबंधित अधिकारियों से मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई की मांग की गई। अभिभावकों और SDMC सदस्यों ने इस मामले से जुड़े दस्तावेजों और जानकारी के साथ लोकायुक्त से शिकायत करने का निर्णय भी लिया है।
विवाद के बीच आर. अशोक ने सोशल मीडिया के जरिए कांग्रेस सरकार पर हमला बोला। उन्होंने सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए जूते और दूसरी आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर सवाल उठाए। अशोक ने जूते खरीदने की प्रक्रिया में कथित तौर पर कमीशन का खेल चलने का आरोप भी लगाया। हालांकि इस आरोप के समर्थन में किसी जांच एजेंसी का निष्कर्ष सामने नहीं आया है और इसे भाजपा नेता के राजनीतिक आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
अशोक ने कहा कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं और सरकार की जिम्मेदारी है कि उन्हें दी जाने वाली सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए। उन्होंने सरकार पर बच्चों के लिए जूते, स्कूल बैग और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने में लापरवाही का आरोप लगाया। इससे पहले भी वह सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को सामग्री उपलब्ध कराने में देरी को लेकर सरकार की आलोचना कर चुके हैं।
बेडासागांव स्कूल में जूतों के अलावा पेयजल की समस्या का मुद्दा भी उठाया गया है। अशोक ने दावा किया कि एक ओर स्कूल में पीने के पानी की समस्या है और दूसरी ओर विद्यार्थियों को दिए जा रहे जूतों की गुणवत्ता को लेकर शिकायत सामने आ रही है। उन्होंने इन मामलों को सरकारी स्कूलों की बुनियादी व्यवस्थाओं से जोड़ते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है।
स्थानीय स्तर पर सामने आई तस्वीरों और रिपोर्टों में विद्यार्थी तथा अभिभावक जूतों को लेकर विरोध करते दिखाई दिए। उनका कहना है कि सरकार की ओर से बच्चों को मुफ्त जूते देना अच्छी योजना है, लेकिन यदि उनकी गुणवत्ता ठीक नहीं होगी तो इसका वास्तविक लाभ विद्यार्थियों तक नहीं पहुंचेगा। अभिभावकों ने संबंधित अधिकारियों से नए और बेहतर गुणवत्ता वाले जूते उपलब्ध कराने की मांग की है।
कर्नाटक में सरकारी स्कूलों के बच्चों को उपलब्ध कराए जा रहे जूतों की गुणवत्ता का मामला केवल उत्तर कन्नड़ तक सीमित नहीं है। हाल में राज्य के कई जिलों से जूतों की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आने के बाद लोकायुक्त ने भी प्रारंभिक जांच के आदेश दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 16 जिलों में कथित तौर पर खराब गुणवत्ता वाले जूते दिए जाने की शिकायतों का डिप्टी लोकायुक्त जस्टिस बी. वीरप्पा ने स्वतः संज्ञान लिया था।
इस जांच के तहत संबंधित जिलों के स्कूल शिक्षा विभाग के डिप्टी डायरेक्टर और ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर से जुड़े मामलों को देखा जा रहा है। लोकायुक्त पुलिस अधीक्षकों को दस्तावेजों और अन्य सामग्री की जांच करने, विद्यार्थियों को दिए गए जूतों का निरीक्षण करने और प्रारंभिक जांच रिपोर्ट दो सप्ताह में देने का निर्देश दिया गया था।
राज्य के कुछ अन्य हिस्सों में भी जूते और मोजों की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आई हैं। विजयनगर जिले के हुविनहडगली क्षेत्र में स्थानीय विधायक ने अधिकारियों से कथित तौर पर खराब गुणवत्ता वाले जूते और मोजे विद्यार्थियों को वितरित नहीं करने को कहा था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि आपूर्ति किए गए सामान पर कंपनी और बाजार मूल्य जैसी जानकारियों को लेकर सवाल उठाए गए।
इसके अलावा मौजूदा शैक्षणिक सत्र में सरकारी स्कूलों के कुछ विद्यार्थियों को नोटबुक, जूते और मोजे मिलने में देरी की शिकायतें भी सामने आई हैं। सितंबर के मध्य की एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के कई सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक वर्ष शुरू होने के महीनों बाद भी विद्यार्थियों को कुछ आवश्यक सामग्री नहीं मिली थी। कुछ स्कूल स्थानीय दानदाताओं, ग्रामीणों और पूर्व विद्यार्थियों की मदद से जरूरत पूरी कर रहे थे।
इन घटनाओं के बीच बेडासागांव स्कूल का मामला सरकार के लिए नई चुनौती बन गया है। विपक्ष इसे सरकारी खरीद और गुणवत्ता नियंत्रण से जोड़कर सवाल उठा रहा है, जबकि स्थानीय अभिभावकों का मुख्य जोर बच्चों को इस्तेमाल योग्य जूते उपलब्ध कराने पर है।
आर. अशोक की ओर से लगाए गए कमीशन संबंधी आरोप की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल उपलब्ध नहीं है। जूतों की खरीद में किसी वित्तीय अनियमितता की बात जांच में साबित होने के बाद ही इसे तथ्य के रूप में स्थापित किया जा सकता है। वहीं बेडासागांव में विद्यार्थियों और अभिभावकों द्वारा जूतों की गुणवत्ता का विरोध किए जाने की पुष्टि स्थानीय रिपोर्टों से होती है।
सरकारी स्कूलों में मुफ्त जूते उपलब्ध कराने का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को आवश्यक स्कूली सामग्री उपलब्ध कराना है। ऐसे में खरीद प्रक्रिया के साथ गुणवत्ता नियंत्रण भी महत्वपूर्ण है। यदि सामान तय मानकों के अनुरूप नहीं होता तो सरकारी खर्च के बावजूद विद्यार्थियों को योजना का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।
अब अभिभावकों और SDMC की मांग है कि विवादित जूतों को वापस लेकर बच्चों को गुणवत्तापूर्ण जूते दिए जाएं और आपूर्ति की जांच की जाए। दूसरी ओर विपक्ष ने इस मामले को लेकर राज्य सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है। लोकायुक्त की ओर से पहले से चल रही व्यापक जांच के बीच बेडासागांव का मामला भी सरकारी स्कूलों में जूतों की खरीद, आपूर्ति और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर रहा है।