गढ़वा। जिले के मेराल थाना क्षेत्र के दलेली गांव में एक माइक्रोफाइनेंस कंपनी के कर्मचारियों को ग्रामीणों द्वारा दिनभर रोके जाने का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि एक महिला के नाम पर उसकी सहमति और जानकारी के बिना दोबारा एक लाख रुपये का लोन स्वीकृत किए जाने को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी थी। विवाद बढ़ने के बाद ग्रामीणों ने भारत माइक्रोफाइनेंस कंपनी के तीन कर्मचारियों को रोक लिया। मामले की जानकारी मिलने पर मेराल थाना पुलिस गांव पहुंची और तीनों कर्मचारियों को अपने साथ थाना ले जाकर पूछताछ शुरू की।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, दलेली गांव निवासी विनोद उरांव की पत्नी बिहानी देवी का भारत माइक्रोफाइनेंस कंपनी से जुड़ा हुआ मामला है। बिहानी देवी के अनुसार, उन्होंने पहले कंपनी से करीब एक लाख रुपये का लोन लिया था। निर्धारित प्रक्रिया के तहत उन्होंने उस लोन की राशि जमा कर दी थी। इसके बाद कुछ समय तक मामला सामान्य रहा।

आरोप है कि पहले लिए गए लोन की राशि जमा करने के कुछ दिनों बाद कंपनी की ओर से महिला के नाम पर दोबारा एक लाख रुपये का लोन स्वीकृत कर दिया गया। महिला का कहना है कि इस संबंध में उन्हें न तो पहले से जानकारी दी गई और न ही उनकी सहमति ली गई। महिला के मुताबिक, जब उन्हें दोबारा लोन स्वीकृत होने की जानकारी मिली तो उन्होंने उस राशि को भी वापस कर दिया।

विवाद उस समय बढ़ गया जब कथित तौर पर कुछ दिनों बाद माइक्रोफाइनेंस कंपनी की ओर से महिला को एक नोटिस भेजा गया। नोटिस में ब्याज समेत करीब सवा दो लाख रुपये जमा करने की बात कही गई थी। इतनी बड़ी रकम की मांग सामने आने के बाद महिला और उसके परिवार ने इसका विरोध किया। परिवार का कहना है कि जब कथित तौर पर दोबारा स्वीकृत राशि भी वापस कर दी गई थी, तो फिर ब्याज समेत करीब 2.25 लाख रुपये की मांग किस आधार पर की जा रही है, यह स्पष्ट नहीं है।

इसी मामले को लेकर गांव में ग्रामीणों और माइक्रोफाइनेंस कंपनी के कर्मचारियों के बीच विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई। ग्रामीणों ने कंपनी के तीन कर्मचारियों को रोक लिया और उनसे कथित लोन तथा महिला के नाम पर जारी की गई राशि को लेकर जानकारी मांगी। ग्रामीणों द्वारा कर्मचारियों को दिनभर रोके जाने की सूचना मिलने के बाद पुलिस सक्रिय हुई।

मामले की जानकारी मिलने पर मेराल थाना पुलिस दलेली गांव पहुंची। पुलिस ने वहां मौजूद माइक्रोफाइनेंस कंपनी के तीनों कर्मचारियों को अपने साथ थाना ले गई। इसके बाद पुलिस ने कर्मचारियों से पूछताछ शुरू की। पुलिस की ओर से यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि महिला के नाम पर दोबारा लोन स्वीकृत किए जाने की प्रक्रिया कैसे हुई और इसके लिए आवश्यक सहमति एवं दस्तावेजों का इस्तेमाल किस प्रकार किया गया।

महिला की ओर से लगाए गए आरोपों की भी पुलिस जांच कर रही है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि कंपनी की ओर से लोन स्वीकृत करने के दौरान किसी प्रकार की तकनीकी या प्रक्रियागत गलती हुई थी अथवा महिला की जानकारी के बिना जानबूझकर लोन दर्ज किया गया। इस संबंध में जांच पूरी होने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

ग्रामीणों के अनुसार, माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की ओर से गांवों में छोटे ऋण उपलब्ध कराए जाते हैं। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार इन ऋणों का इस्तेमाल घरेलू जरूरतों, छोटे कारोबार या अन्य आवश्यक कार्यों के लिए करते हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति के नाम पर बिना जानकारी या सहमति के ऋण दर्ज होने का आरोप गंभीर मामला माना जा रहा है।

इस पूरे विवाद में सबसे अहम सवाल यही है कि महिला के नाम पर दोबारा एक लाख रुपये का लोन किस आधार पर स्वीकृत हुआ। यदि महिला का दावा है कि उन्होंने दोबारा स्वीकृत राशि भी जमा कर दी थी, तो उसके बाद ब्याज सहित करीब सवा दो लाख रुपये की मांग क्यों की गई, इसका जवाब कंपनी के रिकॉर्ड और लेन-देन के दस्तावेजों से ही सामने आएगा।

पुलिस अब संबंधित दस्तावेजों, लोन खाते, भुगतान की जानकारी और कंपनी की ओर से भेजे गए नोटिस की जांच कर सकती है। इसके अलावा महिला और उसके परिवार के सदस्यों के बयान भी लिए जा सकते हैं। कंपनी के कर्मचारियों से पूछताछ के बाद यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि विवाद की वास्तविक वजह क्या है।

फिलहाल मामले में पुलिस की पूछताछ जारी है। ग्रामीणों द्वारा कंपनी के कर्मचारियों को रोके जाने के बाद पुलिस के हस्तक्षेप से स्थिति को संभाला गया। पुलिस जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। महिला के आरोप सही हैं या नहीं, यह जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही तय होगा।

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