झारखंड : देश के कोयला क्षेत्र से जुड़े करीब 4.81 लाख सेवानिवृत्त कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए फिलहाल कोई नई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि कोयला खान पेंशन योजना-1998 में व्यापक संशोधन, न्यूनतम पेंशन में वृद्धि या अन्य नियमों में बदलाव का फिलहाल कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
सरकार के इस रुख से कोयला क्षेत्र के उन लाखों सेवानिवृत्त कर्मचारियों को निराशा हुई है, जो लंबे समय से पेंशन व्यवस्था में सुधार और न्यूनतम पेंशन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। पेंशनभोगियों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत को देखते हुए मौजूदा पेंशन राशि में सुधार की जरूरत है।
कोयला खान पेंशन योजना-1998 के तहत कोयला उद्योग से जुड़े सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन का लाभ दिया जाता है। इस योजना का उद्देश्य कोयला क्षेत्र में लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है।
हालांकि, सरकार ने संसद में जानकारी देते हुए कहा है कि योजना में बड़े बदलाव या न्यूनतम पेंशन में वृद्धि से संबंधित कोई प्रस्ताव वर्तमान में विचाराधीन नहीं है। सरकार के इस जवाब के बाद पेंशनभोगियों की उम्मीदों को झटका लगा है।
कोयला क्षेत्र के पेंशनभोगी संगठन लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि मौजूदा पेंशन व्यवस्था की समीक्षा की जाए। उनका तर्क है कि योजना लागू होने के बाद से समय के साथ महंगाई में काफी वृद्धि हुई है, लेकिन पेंशन में उसी अनुपात में सुधार नहीं हुआ है।
सेवानिवृत्त कर्मचारियों का कहना है कि कई पेंशनभोगी उम्र के अंतिम पड़ाव में हैं और उन्हें स्वास्थ्य, दवाइयों तथा दैनिक जरूरतों पर अधिक खर्च करना पड़ता है। ऐसे में न्यूनतम पेंशन में बढ़ोतरी से उन्हें काफी राहत मिल सकती है।
कोयला उद्योग देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस क्षेत्र में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों ने दशकों तक खदानों और संबंधित संस्थानों में सेवाएं दी हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए पेंशन व्यवस्था को अहम माना जाता है।
पेंशनभोगियों की ओर से समय-समय पर कोयला मंत्रालय और संबंधित विभागों के सामने अपनी मांगें रखी जाती रही हैं। इनमें न्यूनतम पेंशन बढ़ाने, पेंशन फंड को मजबूत करने और योजना में आवश्यक संशोधन करने की मांग प्रमुख रही है।
सरकार की ओर से फिलहाल योजना में बदलाव नहीं करने के निर्णय के बाद अब पेंशनभोगी संगठनों की ओर से आगे की रणनीति पर विचार किया जा सकता है। संगठनों का कहना है कि वे अपनी मांगों को संबंधित मंचों पर उठाते रहेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी पेंशन योजना में बदलाव के लिए वित्तीय स्थिति, फंड की उपलब्धता और लाभार्थियों की संख्या जैसे पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है। सरकार भी ऐसे फैसले लेते समय आर्थिक प्रभावों का आकलन करती है।
कोयला खान पेंशन योजना-1998 में संशोधन की मांग केवल पेंशन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें योजना को लंबे समय तक स्थायी बनाए रखने और लाभार्थियों को बेहतर सामाजिक सुरक्षा देने की मांग भी शामिल है।
फिलहाल केंद्र सरकार के जवाब के बाद यह साफ हो गया है कि निकट भविष्य में कोयला क्षेत्र के पेंशनभोगियों के लिए पेंशन नियमों में किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है। हालांकि, पेंशनभोगी संगठनों की ओर से अपनी मांगों को लेकर प्रयास जारी रहने की उम्मीद है।
करीब 4.81 लाख सेवानिवृत्त कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की नजर अब भविष्य में होने वाली किसी भी नई पहल पर रहेगी। वे उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार आने वाले समय में उनकी आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए कोई सकारात्मक निर्णय ले सकती है।