नई दिल्ली/चंडीगढ़। पंजाब के लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते (DA) तथा महंगाई राहत (DR) के बकाया भुगतान से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की ओर से राज्य के मुख्य सचिव केएपी सिन्हा और अन्य अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक अवमानना की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। इस आदेश से मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार को बड़ी अंतरिम राहत मिली है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बकाया भुगतान का मूल मुद्दा अभी समाप्त नहीं हुआ है। सरकार को भुगतान की ठोस योजना प्रस्तुत करनी होगी।

गुरुवार (5 नवंबर) को न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने आपराधिक अवमानना मामले में आगे की कार्यवाही पर अगले आदेश तक रोक लगाने के साथ ही सिविल अवमानना से संबंधित मामले में भी किसी प्रकार के कठोर कदम नहीं उठाने का निर्देश दिया।

मामला पंजाब सरकार के कर्मचारियों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों को लंबे समय से लंबित महंगाई भत्ते तथा महंगाई राहत की किस्तों का भुगतान नहीं किए जाने से जुड़ा है।

दरअसल, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 3 अगस्त 2026 को महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को लंबित डीए तथा डीआर का भुगतान करे।

हाईकोर्ट ने कहा था कि राज्य में कार्यरत अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों को जिस दर से महंगाई भत्ता दिया जा रहा है, उसी आधार पर राज्य कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बकाया भुगतान का निपटारा किया जाए।

इसके लिए अदालत ने सरकार को लगभग 15 दिन का समय दिया था। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने की स्थिति में बकाया राशि पर छह प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज लगाने का भी निर्देश दिया गया था।

हाईकोर्ट के इस आदेश का पालन नहीं होने पर मामला अवमानना कार्यवाही तक पहुंच गया। कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की ओर से अदालत में शिकायत की गई कि सरकार ने निर्धारित समय में बकाया राशि जारी नहीं की।

इसके बाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव केएपी सिन्हा से जवाब मांगा। अदालत ने उनसे आदेश के अनुपालन की जानकारी प्रस्तुत करने को कहा और व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश भी दिया।

हाईकोर्ट ने अक्टूबर में मुख्य सचिव और अन्य अधिकारियों को आपराधिक अवमानना से संबंधित नोटिस जारी किया था। इस दौरान अदालत के समक्ष सरकारी आदेशों के अनुपालन और सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील से जुड़े तथ्यों को लेकर भी विवाद सामने आया।

मामला गंभीर होने के बाद पंजाब सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह सहित अन्य वकीलों ने पक्ष रखा।

सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने दलील दी कि इतनी बड़ी बकाया राशि का भुगतान कम समय में करना व्यावहारिक और वित्तीय दृष्टि से अत्यंत कठिन है।

सरकार ने अदालत को बताया कि डीए और डीआर के बकाया से जुड़ी देनदारी हजारों करोड़ रुपये की है। सरकार का तर्क था कि इतनी बड़ी रकम जारी करने के लिए बजटीय प्रावधान और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी है।

रिपोर्टों के अनुसार, हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत स्थिति रिपोर्ट में 1 जुलाई 2021 से 30 सितंबर 2026 तक डीए और डीआर की कुल बकाया देनदारी लगभग 22,818 करोड़ रुपये बताई गई थी। वहीं, पूर्व आदेश से संबंधित तत्काल भुगतान की राशि लगभग 14,191 करोड़ रुपये बताई गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मुख्य सचिव के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही को लेकर सवाल उठाए। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने संकेत दिया कि किसी आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों पर इस प्रकार दबाव बनाने की प्रक्रिया उचित नहीं मानी जा सकती।

अदालत ने यह भी जानना चाहा कि कर्मचारियों का मुख्य उद्देश्य बकाया राशि प्राप्त करना है या मुख्य सचिव के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करवाना।

इस दौरान कर्मचारियों की ओर से पेश वकील ने कहा कि उनकी प्राथमिकता हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन और लंबित राशि का भुगतान है।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाते हुए सरकार को बकाया भुगतान के संबंध में सकारात्मक प्रस्ताव प्रस्तुत करने को कहा।

अदालत को बताया गया कि पंजाब सरकार ने महंगाई भत्ते की दर 43 प्रतिशत से बढ़ाकर 53 प्रतिशत कर दी है। इस पर पीठ ने सरकार से पूछा कि मार्च 2027 तक बकाया राशि का कितना हिस्सा जारी किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को इस संबंध में भुगतान योजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि अंतरिम राहत मिलने के बाद भी सरकार को कर्मचारियों की देनदारी के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केवल अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाई है। इसका मतलब यह नहीं है कि कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते के बकाए की मांग समाप्त हो गई है।

बकाया भुगतान का मूल विवाद अभी सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है। पंजाब सरकार की ओर से हाईकोर्ट के मुख्य आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी आगे सुनवाई होनी है।

राज्य सरकार के सामने वित्तीय संसाधनों और कर्मचारियों की देनदारी के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। दूसरी ओर, कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को उम्मीद है कि अदालत की निगरानी में उनके लंबे समय से लंबित भुगतान का समाधान निकलेगा।

महंगाई भत्ता सरकारी कर्मचारियों के वेतन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसका उद्देश्य बढ़ती महंगाई के प्रभाव को कुछ हद तक कम करना है। इसी तरह महंगाई राहत सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन के अतिरिक्त दी जाती है।

लंबे समय तक डीए और डीआर का भुगतान लंबित रहने से कर्मचारियों तथा पेंशनभोगियों की आर्थिक योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। विशेष रूप से सीमित पेंशन पर निर्भर बुजुर्गों के लिए बकाया भुगतान का मुद्दा महत्वपूर्ण है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पंजाब के मुख्य सचिव केएपी सिन्हा और भगवंत मान सरकार को अवमानना कार्यवाही से राहत मिल गई है। लेकिन सरकार को अब यह बताना होगा कि हजारों करोड़ रुपये के बकाए का भुगतान किस तरह और किस समयसीमा में किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई और सरकार की भुगतान योजना पर पंजाब के सरकारी कर्मचारियों तथा पेंशनभोगियों की नजर रहेगी। अदालत का अंतिम फैसला ही तय करेगा कि लंबित महंगाई भत्ते और महंगाई राहत के भुगतान से जुड़े विवाद का समाधान किस प्रकार होगा।

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