रांची: झारखंड में करीब दो दशक तक माओवादी और उग्रवादी संगठनों का प्रभाव सुरक्षा व्यवस्था और विकास के लिए बड़ी चुनौती बना रहा। अब लगातार सुरक्षा अभियानों, शीर्ष नेतृत्व पर कार्रवाई, हथियार और राशन की सप्लाई चेन तोड़ने तथा आत्मसमर्पण-पुनर्वास नीति के चलते कई संगठनों का प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक बीते दो दशकों में करीब दर्जनभर छोटे-बड़े उग्रवादी संगठनों का नेटवर्क कमजोर या निष्क्रिय हुआ है।
चार संगठनों का लंबे समय तक रहा प्रभाव
झारखंड में भाकपा (माओवादी) के अलावा पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (PLFI), तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी (TSPC/TPC) और झारखंड जन मुक्ति परिषद (JJMP) लंबे समय तक प्रमुख उग्रवादी समूहों में गिने गए। TSPC का प्रभाव खासकर चतरा, लातेहार, पलामू, हजारीबाग और रांची से जुड़े कोयला क्षेत्रों में रहा। PLFI की जड़ें झारखंड लिबरेशन टाइगर्स यानी JLT से जुड़ी थीं। JLT पर प्रतिबंध के बाद दिनेश गोप ने PLFI बनाया। यह संगठन लंबे समय तक रंगदारी, लेवी और टेरर फंडिंग से जुड़े मामलों के कारण सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर रहा। इसके शीर्ष नेतृत्व पर लगातार कार्रवाई से संगठन का प्रभाव कमजोर हुआ।
इसके अलावा झारखंड प्रस्तुति कमेटी, सशस्त्र पीपुल्स मोर्चा, संघर्ष जन मुक्ति मोर्चा, झांगुर ग्रुप, पहाड़ी चीता और शांति सेना जैसे छोटे संगठन भी अलग-अलग समय पर सक्रिय रहे। इनमें से कई समूह समय के साथ निष्क्रिय हो गए, जबकि उनके कुछ सदस्य दूसरे आपराधिक नेटवर्क में शामिल हो गए।
सुरक्षा अभियान और आत्मसमर्पण नीति का असर
सुरक्षा बलों ने जंगलों में अभियान चलाने के साथ हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति के रास्तों तथा संगठनात्मक नेटवर्क को निशाना बनाया। दूसरी तरफ सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के तहत हथियार छोड़ने वाले कैडरों को मुख्यधारा में लौटने का विकल्प दिया गया। 2026 के आधिकारिक पुलिस आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में 32 उग्रवादी मारे गए और 38 ने आत्मसमर्पण किया था। वहीं जुलाई 2026 तक 22 उग्रवादी मारे गए और 45 ने आत्मसमर्पण किया। झारखंड पुलिस, CRPF, CoBRA और झारखंड जगुआर की संयुक्त कार्रवाई को इसके प्रमुख कारणों में बताया गया।
इस संघर्ष की कीमत भी बड़ी रही। रिपोर्टों के मुताबिक दो दशकों में माओवाद और उग्रवाद के खिलाफ अभियानों के दौरान 600 से अधिक सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों की जान गई। हालांकि राज्य में इन संगठनों का प्रभाव तेजी से घटा है, लेकिन इसे हर इलाके से हिंसक गतिविधियों के पूर्ण अंत के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। 2025 के आंकड़ों में PLFI, TSPC और JJMP से जुड़ी कुछ घटनाएं दर्ज थीं।
कुल मिलाकर शीर्ष नेतृत्व पर कार्रवाई, गिरफ्तारियां, आत्मसमर्पण और नेटवर्क पर लगातार दबाव ने झारखंड में कभी प्रभावशाली रहे कई उग्रवादी संगठनों की ताकत काफी कम कर दी है।
Tags: